वाक्य-विचार

परिभाषा: भाषा की सबसे छोटी इकाई है वर्ण। वर्णों के सार्थक समूह को शब्द कहते हैं तथा शब्दों के सार्थक समूह को वाक्य अर्थात् वाक्य शब्द–समूह का वह सार्थक विन्यास होता है, जिससे उसके अर्थ एवं भाव की पूर्ण एवं सुस्पष्ट अभिव्यक्ति होती है। अतः वाक्य में आकांक्षा, योग्यता, आसक्ति एवं क्रम का होना आवश्यक है। वाक्य के अंग:

 

सामान्यत: वाक्य के दो अंग माने गये हैं –

(i) उद्देश्य और

(ii) विधेय

 

(i) उद्देश्य:

जिसके सम्बन्ध में वाक्य में कहा जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं। अतः कर्ता ही वाक्य में ‘उद्देश्य होता है, किन्तु यदि कर्ता कारक के साथ उसका कोई विशेषण हो, जिसे कर्ता का विस्तारक कहते हैं, उद्देश्य के ही अन्तर्गत आता है। | यथाः मेरा भाई प्रशान्त धार्मिक पुस्तकें अधिक पढ़ता है।

इस वाक्य में ‘मेरा भाई प्रशान्त उद्देश्य है, जिसमें ‘प्रशान्त’ कर्ता है तो ‘मेरा भाई’ प्रशान्त कर्ता का विशेषण अर्थात् इसे कर्ता का विस्तारक कहेंगे।

 

(ii) विधेय:

उद्देश्य अर्थात् कर्ता के सम्बन्ध में वाक्य में जो कुछ कहा जाता है, उसे ‘विधेय’ कहते हैं। अतः विधेय के अन्तर्गत वाक्य में प्रयुक्त क्रिया, क्रिया का विस्तारक, कर्म, कर्म का विस्तारक, पूरक तथा पूरक का विस्तारक आदि आते हैं उक्त वाक्य में धार्मिक पुस्तकें अधिक पढ़ता है। वाक्यांश विधेय हैं जिसमें ‘पढता है’ शब्द क्रिया है तो ‘अधिक’ शब्द क्रिया का विस्तारक (जो शब्द क्रिया की विशेषता बतलाता है उसे क्रिया का विस्तारक कहते हैं), ‘पुस्तकें’ शब्द कर्म है। तो ‘धार्मिक’ शब्द पुस्तकों की विशेषता बतलाने के कारण पुस्तकें ‘कर्म’ का विस्तारक है। इनके अतिरिक्त यदि कोई शब्द प्रयुक्त होता है या जब वाक्य में क्रिया अपूर्ण होती है तो उसे ‘पूरक’ कहते हैं तथा ‘पूरक’ की विशेषता बतलाने वाले शब्द को ‘पूरक का विस्तारक’ कहते हैं।

 

वाक्य के भेद: क्रिया, अर्थ तथा रचना के आधार पर वाक्यों के निम्न भेद प्रभेद किये जाते हैं

(1) क्रिया की दृष्टि से: क्रिया के आधार पर वाक्य तीन प्रकार के होते हैं।

 

(अ) वाच्य प्रधान: जब वाक्य में प्रयुक्त क्रिया का सीधा व प्रधान सम्बन्ध कर्ता से होता है अर्थात् क्रिया के लिंग, वचन कर्ता कारक के अनुसार प्रयुक्त होते हैं उसे कर्तृवाच्य प्रधान वाक्य कहते हैं।

जैसे: धर्मेन्द्र पुस्तक पढ़ता है।

पिंकी पुस्तक पढ़ती है।

(आ) कर्मवाच्य प्रधान: जब वाक्य में प्रयुक्त क्रिया का सीधा सम्बन्ध वाक्य में प्रयुक्त कर्म से होता है अर्थात् क्रिया के लिंग, वचन कर्ता कारक के अनुसार न होकर कर्म के अनुसार प्रयुक्त होते हैं, उसे कर्मवाच्य प्रधान वाक्य कहते हैं।

यथा: महेन्द्र ने गाना गाया।

वर्षा ने गाना गाया।

(इ) भाव वाच्य प्रधान: जब वाक्य में प्रयुक्त क्रिया न तो कर्ता के अनुसार प्रयुक्त होती है, न ही कर्म के अनुसार बल्कि भाव के अनुसार, तो उसे भाववाच्य प्रधान वाक्य कहते हैं।

यथा : हेमराज से पढ़ा नहीं जाता।।

जया से पढ़ा नहीं जाता।

  1. अर्थ के आधार पर: अर्थ के आधार पर वाक्य 8 प्रकार के होते हैं।

(i) विधानार्थक वाक्य: जिस वाक्य में किसी बात का होना पाया जाता है,उसे विधानार्थक वाक्य कहते हैं।

जैसे- भूपेन्द्र खेलता है।

(ii) निषेधात्मक वाक्य: जिस वाक्य में किसी बात के न होने या किसी विषय के अभाव का बोध हो उसे निषेधार्थक वाक्य कहते हैं।

जैसे- नीता घर पर नहीं है।

(iii) आज्ञार्थक वाक्य: जिस वाक्य में किसी अन्य के द्वारा आज्ञा, उपदेश या आदेश देने का बोध हो, उसे आज्ञार्थक वाक्य कहते हैं यथा

वर्षा, तुम गाना गाओ।

(iv) प्रश्नार्थक वाक्य: जिस वाक्य में प्रश्नात्मक भाव प्रकट हो अर्थात् किसी कार्य या विषय के सम्बन्ध में प्रश्न पूछने का बोध हो, उसे प्रश्नार्थक वाक्य कहते हैं।

जैसे- कौन गाना गा रही हैं?

(v) इच्छार्थक वाक्य: जिस वाक्य में इच्छा या आशीर्वाद के भाव का बोध हो, उसे इच्छार्थक वाक्य कहते हैं।

यथा- भगवान करे, तुम्हारा भला हो।

(vi) संदेहार्थक वाक्य: जिस वाक्य में सम्भावना या सन्देह का बोध हो उसे संदेहार्थक वाक्य कहते हैं जैसे – उन दोनों में जाने, कौन खेलेगा।

(vii) संकेतार्थक वाक्य: जिस वाक्य में संकेत या शर्त का बोध हो, उसे संकेतार्थक वाक्य कहते हैं। जैसे- यदि तुम पैसे दो तो मैं चलूँ।

दूसरों का भला करोगे तो तुम्हारा भी भला होगा।

(viii) विस्मय बोधक वाक्य: जिस वाक्य से विस्मय, आश्चर्य आदि का भाव प्रकट हो, उसे विस्मयबोधक वाक्य कहते हैं

यथा: वाह! कैसा नयनाभिराम दृश्य है।

 

  1. रचना के आधार पर: रचना के आधार पर वाक्य तीन प्रकार के होते हैं

(i) साधारण वाक्य: जिस वाक्य में एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय हो, उसे साधारण वाक्य कहते हैं।

जैसे- नीता खाना बना रही है।

(ii) मिश्र या मिश्रित वाक्य: जिस वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य तथा एक या एक से अधिक आश्रित उपवाक्य हों, उसे मिश्र या मिश्रित वाक्य कहते हैं।

जैसे- गाँधी जी ने कहा कि सदा सत्य बोलो।

इस वाक्य में प्रधान उप वाक्य तथा आश्रित उपवाक्य का निर्णय करने से पूर्व प्रधान उपवाक्य एवं आश्रित उपवाक्यों के विषय में जानकारी कर लेनी चाहिए।

(अ) प्रधान उपवाक्य: जो उपवाक्य प्रधान या मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय से बना हो उसे ‘प्रधान उपवाक्य’ कहते हैं। उपर्युक्त वाक्य में ‘गाँधी जी ने कहा’ प्रधान उपवाक्य है जिसमें ‘गाँधी जी मुख्य उद्देश्य है तो ‘कहा’ मुख्य विधेय। ।

(आ) आश्रित उपवाक्य: जो उपवाक्य प्रधान उपवाक्य के आश्रित रहता है, उसे आश्रित उपवाक्य कहते हैं। उपर्युक्त वाक्य में ‘कि सदा सत्य बोलो’ आश्रित उपवाक्य है।

आश्रित उपवाक्य तीन प्रकार के होते हैं:

(a) संज्ञा उपवाक्य: जब किसी आश्रित उपवाक्य का प्रयोग प्रधान उपवाक्य की किसी संज्ञा के स्थान पर होता है तो उसे संज्ञा उपवाक्य कहते हैं। ‘संज्ञा उपवाक्य’ का प्रारम्भ प्रायः ‘कि’ से होता है। उक्त वाक्य में ‘कि सदा सत्य बोलो’ ‘कि’ से प्रारम्भ होने के कारण संज्ञा उपवाक्य कहलायेगा।

(i) विशेषण उपवाक्य: जब कोई आश्रित उपवाक्य प्रधान उपवाक्य के किसी संज्ञा या सर्वनाम शब्द की विशेषता बतलाये तो उस उपवाक्य को ‘विशेषण उपवाक्य’ कहते हैं। विशेषण उपवाक्य का प्रारम्भ प्रायः जो, जिसका, जिसकी, जिसके आदि में से किसी शब्द से होता है।

जैसे- जो विद्वान होते हैं, उनका सभी आदर करते हैं।

(ii) क्रिया विशेषण उपवाक्य: जब कोई आश्रित उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की क्रिया की विशेषता बतलाये या सूचना दे, उस आश्रित उपवाक्य को ‘क्रिया विशेषण उपवाक्य’ कहते हैं। क्रिया विशेषण उपवाक्य प्राय: यदि, जहाँ, जैसे, यद्यपि, क्योंकि, जब, तब आदि में से किसी शब्द से शुरू होता है यथा –

यदि राम परिश्रम करता, तो अवश्य उत्तीर्ण होता।

  1. संयुक्त वाक्य: जिस वाक्य में दो या दो से अधिक साधारण वाक्य या प्रधान उपवाक्य या समानाधिकरण उपवाक्य, किसी संयोजक शब्द (तथा, एवं, या, अथवा, और, परन्तु, लेकिन, किन्तु, बल्कि, अतः आदि) से जुड़े हों, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं। यथा

भरत आया किन्तु भूपेन्द्र चला गया।

(समानाधिकरण उपवाक्य – ऐसे उपवाक्य जो प्रधान उपवाक्य या आश्रित उपवाक्य के समान अधिकार वाला हो उसे समानाधिकरण उपवाक्य कहते हैं।)

वाक्य विश्लेषण

रचना के आधार पर बने वाक्यों को उनके अंगों सहित पृथक कर उनका पारस्परिक संबंध बताने को वाक्य विश्लेषण कहते हैं।

 

  1. साधारण वाक्य का वाक्य विश्लेषण: साधारण वाक्य के वाक्य विश्लेषण में सर्वप्रथम साधारण वाक्य के दो अंग-उददेश्य तथा विधेय को बतलाना होता है, तत्पश्चात उद्देश्य के अंगों कर्ता तथा कर्ता का विस्तारक तथा ‘विधेय’ के अन्तर्गत कर्म, कर्म का विस्तारक, परक, पूरक का विस्तारक तथा क्रिया एवं क्रिया के विस्तारक जो भी हो, उसका उल्लेख करना होता है।

यथा: मेरा भाई प्रशान्त धार्मिक पुस्तकें बहुत पढ़ता है!

 

उद्देश्यविधेय
कर्ताकर्ता का विस्तारककर्मकर्म का विस्तारकपूरकपूरक का विस्तारकक्रियाक्रिया का विस्तारक
प्रशान्तमेरा भाईपुस्तकेंधार्मिक­-पढ़ता है।बहुत

 

 

आगरा का ताजमहल दर्शनीय स्थल है।

 

उद्देश्यविधेय
कर्ताकर्ता का विस्तारककर्मकर्म का विस्तारकपूरकपूरक का विस्तारकक्रियाक्रिया का विस्तारक
ताजमहलआगरास्थल है।दर्शनीय

 

 

  1. मिश्र या मिश्रित वाक्य का वाक्य विश्लेषण: मिश्र या मिश्रितवाक्य के वाक्य विश्लेषण में उसके प्रधान उपवाक्य तथा आश्रित उपवाक्य एवं उसके प्रकार का उल्लेख किया जाता है। यथा –

(i) सुशील ने कहा कि मैं गाँव नहीं जाऊँगा।

(ii) जो परिश्रम करते हैं, वे सफल होते हैं।

(iii) श्याम को गाड़ी नहीं मिली, क्योंकि वह समय पर नहीं गया।

 

 प्रधान उपवाक्यआश्रित उपवाक्यउपवाक्य का प्रकार
1.सुशील ने कहाकि मैं गाँव नहीं जाऊँगा।संज्ञा उपवाक्य
2.वे सफल होते हैं।जो परिश्रम करते हैं।विशेषण उपवाक्य
3.श्याम को गाड़ीं मिलीक्योंकि वह समय पर नहीं  गया।क्रिया विशेषण उपवाक्य

 

 

  1. संयुक्त वाक्य का वाक्य विश्लेषण: संयुक्त वाक्य के विश्लेषण में साधारण वाक्यों या प्रधान उपवाक्यों या समानाधिकरण उपवाक्यों के उल्लेख के साथ उन्हें जोड़ने वाले संयोजक शब्द का उल्लेख करना होता है।

यथा – कृष्ण बाँसुरी बजाते थे और राधा नाचती थी।

 

साधारण वाक्यप्रधानउपावाक्यसमानाधिकरण उपवाक्यसंयोजक शब्द
कृष्ण बाँसुरी बजाते थेराधा नाचती थी। –और

 

वाक्य में पदों का क्रम:

प्रत्येक भाषा की वाक्य रचना में पदों का एक निश्चित क्रम होता है। हिन्दी में इस सम्बन्ध में कुछ नियम इस प्रकार हैं-

  1. सामान्य वाक्यों में पहले कर्ता फिर कर्म तथा अन्त में क्रिया होती है।

जैसे – अभिषेक गाना गाता है।

  1. यदि वाक्य में सम्बोधन या विस्मयादिबोधक है, तो वह कर्ता से पहले आता है।

जैसे- प्रशान्त, मेरी बात सुनो।

अरे! हरिण भाग गया।

  1. कर्ता, कर्म तथा क्रिया के विस्तारक क्रमश: इनसे पहले ही आते हैं।

जैसे – भूखा भिखारी गर्म रोटी जल्दी-जल्दी खा गया।

  1. पदवी या व्यवसाय-सूचक शब्द नाम से पहले आते हैं।

जैसे – डॉ. आलोक आज जापान जायेंगे।

प्रोफेसर अशोक छात्रों को पढ़ा रहे हैं।

  1. वाक्य में सम्बन्ध कारक का प्रयोग सम्बन्धी से पहले किया जाता है।

जैसे – यह गोविन्द का घर है।

  1. क्रियाविशेषण क्रिया से पहले लगाया जाता है।

जैसे – घोड़ा तेज दौड़ता है।

  1. प्रश्नवाचक पद प्रायः व्यक्ति या विषय से पूर्व लगाया जाता है।

जैसे – तुम किस व्यक्ति की बात कर रहे हो?

  1. पूर्वकालिक क्रिया मुख्य क्रिया से पहले आती है।

जैसे – वह खाना खाकर चला गया।

  1. द्विकर्मक क्रिया में गौण कर्म पहले और मुख्य कर्म बाद में आता है।

जैसे – अशोक ने सुशील को पुस्तक दी।

  1. निषेधात्मक वाक्यों में ‘न’ अथवा ‘नहीं’ का प्रयोग प्रायः क्रिया से पूर्व किया जाता है।

जैसे – दुष्यन्त वहाँ नहीं जायेगा।

 

करण कारक, सम्प्रदान कारक, अपादान कारक तथा अधिकरण कारक कर्ता और कर्म के मध्य रखे जाते हैं तथा वाक्य में इनका प्रयोग विपरीत क्रम यानी अधिकरण, अपादान, सम्प्रदान, करण कारक में होता है।

जैसे – टीना ने कागज पर रिंकु के लिए पेन्सिल से चित्र बनाया।

  1. पूरक, कर्तृ पूरक स्थिति में सदैव कर्ता के बाद तथा कर्म पूरक स्थिति में कर्म के बाद रहता है।
  2. मिश्रवाक्य की संरचना में प्रधान वाक्य प्रायः आश्रित उपवाक्य के पहले आता है।

जैसे – गाँधी जी ने कहा कि सदा सत्य बोलो।

राम सफल नहीं हुआ क्योंकि वह पढ़ा नहीं।

  1. मिश्र या संयुक्त वाक्यों में योजक दो उपवाक्यों के बीच प्रयुक्त होता है।

जैसे – तुम इसी समय रवाना हो जाओ ताकि गाड़ी मिल जाय।

कृष्ण बाँसुरी बजा रहे हैं और राधा नाच रही है।

 

वाक्य में पदों की अन्विति:

किसी वाक्य में पदों का सही क्रम ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि उसके पदों में अन्विति का होना भी आवश्यक होता है। ‘अन्विति’ का अर्थ होता है- ‘सम्बद्धता’। अर्थात् वाक्य में प्रयुक्त विभिन्न पदों में उचित मेल होना आवश्यक है।

  1. कर्ता और क्रिया की अन्विति:

(i) कर्ता के साथ परसर्ग नहीं होने पर क्रिया ‘कर्ता’ के लिंग, वचन के अनुसार होती है।

जैसे – राम पुस्तक पढ़ता है।

सीता पुस्तक पढ़ती है।

(ii) वाक्य में भिन्न लिंग और वचन के अनेक कर्ता परसर्ग रहित हों तो क्रिया बहुवचन में होती है तथा उसका लिंग अन्तिम कर्ता के अनुसार होता है।

जैसे – लड़के और लड़कियाँ खेलती हैं।

लड़कियाँ और लड़के खेलते हैं।

(iii) यदि एक से अधिक कर्ता परसर्ग रहित हों और अन्त में समूह वाचक शब्द हो तो क्रिया बहुवचन में होती हैं।

जैसे – राम, श्याम, राधा सब जा रहे हैं।

(iv) यदि एक से अधिक परसर्ग रहित कर्ता एक ही पुरुष, लिंग के एक वचन हों, तो क्रिया इसी लिंग के बहुवचन में होगी।

जैसे – नीता, मीता और सीता खेल रही हैं।

(v) यदि भिन्न लिंग, वचन के परसर्ग रहित एक वचन के कर्ता और, तथा, आदि से जुड़े हों, तो वाक्य में क्रिया बहुवचन पुल्लिंग में होगी।

जैसे – शाह और बेगम सुरैया विमान से उतरे।

राम और सीता वन से नहीं आए।

(vi) यदि भिन्न लिंग वचन के परसर्ग रहित कर्ता एकवचन हों तथा वाक्य में विभाजक समुच्चय बोधक (अथवा, या) लगा हो, तो क्रिया का लिंग वचन अन्तिम कर्ता के लिंग, वचन के अनुसार होगा।

जैसे – गुंजन या अभिषेक चला गया।

प्रशान्त अथवा वर्षा गाना गायेगी।

(vii) आदरसूचक एक वचन कर्ता के साथ क्रिया बहुवचन में आती है।

जैसे – माताजी खाना बना रही हैं।

गुरुजी पढ़ा रहे हैं।

(viii) कर्ता का लिंग अज्ञात होने पर क्रिया पुल्लिंग ही होती है।

जैसे – कौन आया है?

वहाँ कोई खड़ा है।

(ix) हिन्दी में आँसू, होश, प्राण, हस्ताक्षर, दर्शन, भाग्य आदि शब्दों का प्रयोग सदैव बहुवचन में ही होता है।

जैसे – आज आपके दर्शन हो गये।

ये मेरे ही हस्ताक्षर हैं।

  1. कर्म और क्रिया की अन्विति:

(i) यदि कर्ता परसर्ग ‘ने’ सहित हो तथा कर्म के साथ ‘को’ न लगा हो, तो क्रिया कर्म के लिंग, वचन के अनुसार होती है।

जैसे – भूपेन्द्र ने आम खाया।

नीता ने आम खाया।

महेन्द्र ने चाय पी।

सन्तोष ने चाय पी।

(ii) यदि कर्ता और कर्म दोनों के साथ परसर्ग लगा हो तो क्रिया एकवचन, पुल्लिंग और अन्यपुरुष में होती है।

जैसे – राम ने मोहन को पीटा।

सीता ने गीता को पीटा।

लड़कियों ने लड़कों को मारा।

पुलिस ने चोर को पकड़ा।

(iii) परसर्ग सहित कर्ता के साथ एक से अधिक कर्म समान लिंग, वचन के होने पर क्रिया उन्हीं लिंग, वचन में होगी।

जैसे – मैंने आम और केले खरीदे।

उसने पुस्तक और कापी खरीदी।

(iv) यदि कर्ता के साथ परसर्ग ‘ने लगा हो और वाक्य में दो कर्म हों, तो क्रिया अन्तिम कर्म के अनुसार होती है।

जैसे – राम ने पस्तकें और रबड खरीदा।

सीता ने रबड़ और पेन्सिलें खरीदीं।

 

  1. संज्ञा और सर्वनाम की अन्विति:

(i) वाक्य में सर्वनाम का वचन उस संज्ञा के वचन के अनुसार होता है, जिसके स्थान पर वह प्रयुक्त हुआ है।

जैसे – राम ने कहा, “मैं पत्र लिखूँगा।”

छात्रों ने कहा, “हम खेल खेलेंगे।”

(ii) जो सर्वनाम अनेक संज्ञाओं के स्थान पर आए, वह बहुवचन होता है।

जैसे – गीता, सीता, नीता अजमेर गईं, वे कल लौटेंगी।

(iii) किसी एक संज्ञा के स्थान पर एक ही सर्वनाम का प्रयोग उचित है, अलग-अलग नहीं।

जैसे – राम ने अपने बड़े भाई से कहा ‘आप जल्दी जाइये, आपको देर हो जायेगी।’

 

  1. विशेषण और विशेष्य का मेल:

(i) विशेषण का प्रयोग विशेष्य के अनुसार होता है। आकारान्त विशेषण विशेष्य के लिंग, वचन के अनुसार प्रायः बदल जाते हैं।

जैसे – (i) तुम पीला कुरता पहनो।

(ii) वह पीली साड़ी पहनेगी।

(iii) पीले झण्डे फहरा रहे हैं।

किन्तु अन्य विशेषण में विशेष्य के अनुसार परिवर्तन नहीं होता है – लाल कमीज, लाल साड़ियाँ, लाल झण्डे।

(iv) यदि वाक्य में एक से अधिक विशेष्य हों तो विशेषण अपने निकट वाले विशेष्य के अनुरूप होगा। जैसे- काली टोपियाँ और कुरते लाओ।

काले कुरते और टोपियाँ लाओ।

 

  1. सम्बन्ध और सम्बन्धी का अन्वय:

(i) वाक्य में आने वाले सम्बन्ध वाचक शब्दों के लिंग, वचन सम्बन्धी के लिंग, वचन के अनुरूप होते हैं।

जैसे – यह राम की गाय है। (प्रस्तुत वाक्य में सम्बन्धी ‘गाय’ के अनुरूप सम्बन्ध वाचक ‘की स्त्रीलिंग, एकवचन का प्रयोग हुआ है।)

ये राजा के घोड़े हैं। (यहाँ सम्बन्धी ‘घोड़े’ के अनुरूप सम्बन्ध वाचक ‘के’ पुल्लिंग, बहुवचन का प्रयोग हुआ है।)

(ii) एक वाक्य में भिन्न लिंग वचन की अनेक संज्ञाएँ सम्बन्धी तो सम्बन्ध कारक अपने बाद में आने वाली संज्ञा के अनुरूप होगा। जैसे

(अ) उसकी अँगूठी और हार तैयार है। (उसकी अँगूठी के अनुसार)

(आ) उसका हार और अँगूठी तैयार है। (उसका हार के अनुसार)

(इ) उसके कपड़े और जूते लाओ। (उसके कपड़े के अनुसार)

(ई) उसकी पुस्तक और पेन खो गया। (उसकी पुस्तक के अनुसार)

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