Privatisation of Indian Railway

There is much news in the air that Indian railway is going to be privatised. But Railway Minister Piyush Goyal said, “Indian government is not going to privatise Indian Railway or premium trains i.e. Rajdhani & Shtabadi Express. But they said that government is working to impalement PPP (Public Private Partnership) in various sector of Indian Railway.

 

In a written answer in Lok Sabha Railway Minister Piyush Goyal said, “No specific passenger train has been identified to be run by private payers so far.

However, Sources have said that railway has found New Delhi-Lucknow Tejas Express, but no official announcement has me made yet.

 

But Indian Railways is moving fast towards for privatization of railway stations on Public Private Partnership (PPP) projects. The stations will be allocated to the private firms through auction. The firms getting tender will be allowed to modernise the stations. As part of the modernisation of stations, Railways will allow developers to build malls, cinema halls, hotels and specialty hospitals within the station premises.

 

The redevelopment of the stations is occurring through different phases. In the first phase, the responsibility of redevelopment had been given to Indian Railway Station Development Corporation (IRSDC), a joint venture Company of Ircon International Limited and Rail Land Development Authority.

Earlier, in 2014 India allowed 100% FDI in railways infrastructure through automatic route. Through this foreign companies have established two rail loco factories in Bihar with an investment of Rs 3500 crore. According to the railway official, various investors from Japan and South Korea have also expressed in the station redevelopment projects and the government has queued up 400 stations for redevelopment.

 

 

The private participation in public sector indicates the implementation Bibek Debroy committee report. The pro-privatisation wing is substantiating their point on the basis of it. The report favored private participation which is said to be the key to increase the efficiency of the system. The committee has also looked at the railway restructuring experiences from multiple countries, including Japan, the United Kingdom, Germany, Sweden, Australia, and the USA, as examples.

 

Indian Railways runs more than 12,000 trains which carry both 2.3 crore (aprox) people and 3 million tons of goods every day. The majority of the Indian populations, who cannot afford private vehicles, rely on the public transportation system. Railways are the most viable mode of transport for this section of the society.

 

Pros and cons of privatization

Pros

  • Improved Infrastructure.
  • World class service.
  • Lesser Accidents.

 

Cons

  • High fares.
  • Less popular/profitable routes may be eliminated.
  • Accountability (Government & private company may blame each-other on any fault or in unwanted situation).

Final Conclusion

Railways operation should be in the hands of government but infrastructure and maintenance should be with private sector. But that too is an issue, government & private company may blame each-other on any fault or in unwanted situation. So government should regulate this and provide a path like overlapping departments should come under a common contractor. This will enhance our journey to next level.

 

हिंदी में

 

भारतीय रेलवे का निजीकरण

सुनने में आ रहा है कि भारतीय रेलवे का निजीकरण होने जा रहा है। लेकिन रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, ” भारत सरकार भारतीय रेलवे या प्रीमियम ट्रेनों का निजीकरण नहीं करने जा रही है, यानी राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस। लेकिन उन्होंने कहा कि सरकार भारतीय रेलवे के विभिन्न क्षेत्रों में पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) लगाने के लिए काम कर रही है।

 

लोकसभा में एक लिखित जवाब में रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “निजी भुगतानकर्ताओं द्वारा अब तक किसी विशिष्ट यात्री ट्रेन की पहचान नहीं की गई है।

हालांकि, सूत्रों ने कहा है कि रेलवे को नई दिल्ली-लखनऊ तेजस एक्सप्रेस मिल गई है, जो भारत की प्रथम निजी रेलगाड़ी हगो सकती है। लेकिन अभी तक मुझे कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

 

लेकिन भारतीय रेलवे सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) परियोजनाओं पर रेलवे स्टेशनों के निजीकरण के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है। नीलामी के जरिए स्टेशनों को निजी फर्मों को आवंटित किया जाएगा। टेंडर पाने वाली फर्मों को स्टेशनों का आधुनिकीकरण करने की अनुमति दी जाएगी। स्टेशनों के आधुनिकीकरण के हिस्से के रूप में, रेलवे डेवलपर्स को स्टेशन परिसर के भीतर मॉल, सिनेमा हॉल, होटल और विशेष अस्पताल बनाने की अनुमति देगा।

 

स्टेशनों का पुनर्विकास विभिन्न चरणों के माध्यम से हो रहा है। पहले चरण में, पुनर्विकास की जिम्मेदारी इंडियन रेलवे स्टेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (IRSDC) को दी गई थी, जो इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड और रेल भूमि विकास प्राधिकरण की एक संयुक्त उद्यम कंपनी थी।

इससे पहले, 2014 में भारत ने स्वचालित मार्ग से रेलवे के बुनियादी ढांचे में 100% FDI की अनुमति दी थी। इसके माध्यम से विदेशी कंपनियों ने बिहार में 3500 करोड़ रुपये के निवेश के साथ दो रेल लोको कारखाने स्थापित किए हैं। रेलवे अधिकारी के अनुसार, जापान और दक्षिण कोरिया के विभिन्न निवेशकों ने स्टेशन पुनर्विकास परियोजनाओं में भी व्यक्त किया है और सरकार ने पुनर्विकास के लिए 400 स्टेशनों को कतारबद्ध किया है।

 

सार्वजनिक क्षेत्र में निजी भागीदारी कार्यान्वयन बिबेक देबरॉय समिति की रिपोर्ट को इंगित करती है। प्रो-निजीकरण विंग इसके आधार पर अपनी बात प्रमाणित कर रहा है। रिपोर्ट ने निजी भागीदारी का पक्ष लिया, जिसे सिस्टम की दक्षता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण बताया जाता है। समिति ने उदाहरण के रूप में जापान, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई देशों के रेलवे पुनर्गठन अनुभवों को भी देखा है।

 

भारतीय रेलवे 12,000 से अधिक रेलगाड़ियाँ चलाती है जो हर दिन 2.3 करोड़ (aprox) लोगों और 3 मिलियन टन माल ले जाती है। अधिकांश भारतीय आबादी, जो निजी वाहनों का वहन नहीं कर सकते, सार्वजनिक परिवहन प्रणाली पर निर्भर हैं। रेलवे समाज के इस हिस्से के लिए परिवहन का सबसे व्यवहार्य तरीका है।

 

निजीकरण के पक्ष और विपक्ष

 

पक्ष

  • बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर।
  • विश्व स्तरीय सेवा।
  • कम दुर्घटनाएँ।

 

विपक्ष

  • उच्च किराया।
  • कम लोकप्रिय / लाभदायक मार्गों को समाप्त किया जा सकता है।
  • जवाबदेही (सरकारी और निजी कंपनी किसी भी दोष या अवांछित स्थिति में एक-दूसरे को दोष दे सकती है)।

 

अंतिम निष्कर्ष

रेलवे का संचालन सरकार के हाथों में होना चाहिए लेकिन बुनियादी ढाँचा और रखरखाव निजी क्षेत्र के पास होना चाहिए। लेकिन यह भी एक मुद्दा है, सरकारी और निजी कंपनी किसी भी दोष या अवांछित स्थिति में एक-दूसरे को दोषी ठहरा सकते हैं। इसलिए सरकार को इसे विनियमित करना चाहिए और एक रास्ता प्रदान करना चाहिए जैसे ओवरलैपिंग विभाग एक सामान्य ठेकेदार के तहत आने चाहिए। यह हमारी यात्रा को अगले स्तर तक बढ़ाएगा।

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