Animal Kingdom

जीव विज्ञान

 

परिचय

  • अरस्तू को जीव विज्ञान का पिता कहा जाता है।
  • ल्यूवेनहॉक ने साधारण सूक्ष्मदर्शी का अविष्कार किया तथा जीवित कोशिकाओं का अध्ययन किया।
  • एलेक्जेण्डर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन की खोज की।
  • कैरोलस लिनियस ने विनाम पद्धति का प्रचलन पादप तथा जंतुओं के नामकरण हेतु किया।
  • चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन के आनुवांशिकता की व्याख्या पैनजेनेसिस सिद्धांत के द्वारा की तथा प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों के विकास का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
  • ग्रेगर जॉन मेण्डल ने आनुवांशिकता के सिद्धांतों की खोज की।
  • लैमार्क ने उयार्जित लक्षणों की वंशागति के सिद्धांत को प्रस्तुत किया।
  • लुई पाश्चर ने जीवाणुवाद प्रस्तुत किया।
  • उसने निर्जीवीकरण के लिए पाश्चुरीकरण प्रक्रिया को प्रस्तुत किया।
  • रॉबर्ट हुक ने यौगिक सूक्ष्मदर्शी का निर्माण किया तथा कॉर्क में कोशिकाओं की खोज की।
  • विलियम हार्वे ने रुधिर परिसंचरण की खोज की।
  • टी. एच. मारगन ने जीन सिद्धांत को प्रस्तुत किया।
  • डेविड बल्टीमोर ने विलोम ट्रांसक्रिप्टेज की खोज की।
  • हिप्पोक्रेटस को पाश्चात्य औषधि का जनक कहा जाता है।
  • एडवर्ड जेनर ने प्रथम बार छोटी माता (चेचक) के लिए प्रभावी टीका (वैक्सीन) का अविष्कार किया। इन्हें प्रतिरक्षा विज्ञान का जनक कहा जाता है।
  • जोसेफ लिस्टर ने पहली बार घावों को जीवाणु रहित करने के लिए एंटीसेप्टिक रसायन का प्रयोग किया।
  • रॉबर्ट ब्राउन ने कोशिका केन्द्रक की खोज की।
  • सलीम अली को पक्षी पुरुष कहा जाता है।
  • हर गोविन्द खुराना को 1968 में नोबल पुरस्कार दिया गया। इन्होंने बताया कि न्यूक्लिक अम्लों में उपस्थित न्यूक्लियोटाइड प्रोटीन संश्लेषण को नियंत्रित करते हैं।

 

जन्तु जगत

परिचयः जन्तुओं में विभिन्न प्रकार के प्राणी सम्मिलित हैं। ये सामान्यतः बहुकोशिकीय, परपोषी गतिमान, संवेदी अंगों से युक्त तथा तंत्रिका तंत्र वाले होते हैं।

  1. संघ. प्रोटोजोआ
  • ये एक कोशिकीय होते हैं। जीवद्रव्य केन्द्रक युक्त होता है। ये स्वतंत्रजीवी तथा परजीवी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
  • श्वसन तथा उत्सर्जन की क्रियाएँ विसरण विधि से सम्पन्न होती हैं।
  • उदाहरण- अमीबा, पैरामीसियम आदि।
  1. संघ. पोरिफेरा
  • इसके सदस्यों को स्पंज कहा जाता है। ये ज्यादातर सागरीय जल में रहते हैं।
  • ये एकल या सामुदायिक जीवन के अभ्यस्त होते हैं।
  • इनके मुख्य उदाहरण हैं- साइकन,स्पांजिला, यूस्पांजिया आदि।
  1. संघ. सीलेंटरेटा (निडेरिया)
  • ये मुख्यतः सागरीय जल के लिए अनुकूलित रहते हैं।
  • ये समूह में या एकल जीवन यापन करते हैं। ये स्वतंत्र रूप से प्लवनशील होते हैं।
  • इनका शरीर त्रिज्य सममित होता हैं।
  • इनके प्रमुख उदाहरण हैं- फाइसेलिया, अडेम्सिया पेन्नाटुला, गार्गोनिया तथा मियानड्रिना।
  1. संघ. टिनोफोरा
  • शरीर द्विस्तरीय होता है।
  • शरीर त्रिज्य सममित होता है।
  • शरीर ऊतकों के संगठन से निर्मित होता है।
  • उदाहरण- हर्मिफोरा, प्लियरोब्रांकिया, सेस्टम इत्यादि।

 

  1. संघ. प्लेटिहेल्मिंथिस
  • ये ज्यादातर अंतः परजीवी, द्विपार्श्व सममित तथा गुहा युक्त प्राणी होते हैं।
  • इसमें अंग तंत्र पाया जाता है।
  • उदाहरण- फीताकृमि, लीवर फ्ल्यूक आदि ।
  1. संघ. एस्केल्मिंथिस
  • ये स्वतंत्रजीवी, जलीय या स्थलीय हो सकते हैं।
  • ये जंतुओं तथा पौधों पर परजीवी हो सकते हैं।
  • उदाहरण- एस्कैरिस, वुचरेरिया, एंसाइक्लोमेटा।
  1. संघ. एनिलिडा
  • शरीर पतला, लम्बा द्विपार्श्व सममित तथा खंड युक्त होता है।
  • श्वसन सामान्यतः त्वचा के द्वारा होता है।
  • उदाहरण- जोंक, नेरिस तथा केंचुआ इत्यादि।
  1. संघ. आर्थोपोडा
  • शरीर सिर, वक्ष एवं उदर में विभाजित होता है।
  • देहगुहा को हीमोसील कहा जाता है।
  • ट्रैकिया गिल्स, बुक लंग्स तथा सामान्य सतह के द्वारा श्वसन क्रिया संपन्न होती है।
  • उदाहरण- कॉक्रोच, मक्खी, मच्छर, केकड़ा आदि।
  1. संघ. मोलस्का
  • शरीर सिर, अंतरांग तथा पाद में विभाजित होता है।
  • आहार नाल पूर्ण विकसीत होती है।
  • श्वसन गिल्स या टीनिडिया द्वारा सम्पन्न होता है।
  • उदाहरण-शंख, सीप तथा घोंघा आदि।
  1. संघ. इकाइनोडर्मेटा
  • इसके सभी सदस्य समुद्री होते हैं। गति तथा भोजन ग्रहण के लिए नाल पाद होते हैं।
  • उदाहरण- समुद्री खीरा, स्टार मीन,पंखतारा आदि।
  1. संघ–हेमीकाडर्मेटा
  • ये त्रिस्तरीय, द्विपार्श्व सममित वाले होते हैं।
  • उदाहरण- बलैनोग्लासस, सैकग्लाससआदि।
  1. संघ–कार्डेटा
  • इनमें नोटोकार्ड उपस्थित होता है। क्लोम छिद्र उपस्थित होते हैं।
  • तंत्रिका रज्जु उपस्थित होता है।
  • उदाहरण- हर्डमैनिया
  • संघ-कार्डेटा में निम्न वर्ग होते हैं-

 

(i). मत्स्य वर्ग

  • हृदय द्विवेश्मी होता है तथा केवल इसमें मात्र अशुद्ध रूधिर का ही पम्पिंग होता है।
  • श्वसन प्रक्रिया गिल्स द्वारा संपन्न होती है।
  • उदाहरण- स्कोलियोडान, टारपीडो आदि।

 

(ii). उभयचर वर्ग

  • ये जलीय तथा स्थलीय अनुकूलता को प्रदर्शित करते हैं।
  • शरीर असमतापी होता है।
  • हृदय में दो आलिंद तथा एक निलय होता है।
  • उदाहरण- मेंढ़क, टोड, हाइला, इक्थियोफीस आदि।

 

(iii). सरीसृप वर्ग

  • ये सामान्यतः रेंगने वाले प्राणी तथा अण्डज होते हैं।
  • उदाहरण- साँप, कछुआ, छिपकली तथा मगरमच्छ आदि।

 

(iv). पक्षी वर्ग

  • ये ज्यादातर उड़ने वाले प्राणी होते हैं।
  • हृदय में दो आलिंद तथा दो निलय होते
  • मूत्राशय अनुपस्थित होता है।
  • उदाहरण- मोर, कबूतर, गौरैया आदि ।

 

(v). स्तनी वर्ग

  • इनकी त्वचा पर श्वेद ग्रंथियाँ तथा तैल ग्रंथियाँ उपस्थित होती हैं।
  • ये जंतु समतापी होते हैं।
  • हृदय में दो अलिंद तथा दो निलय होते हैं।
  • सामान्यतः शिशुओं को जन्म देते हैं।
  • उदाहरण- मनुष्य, लोमड़ी, कुत्ता आदि।

 

कोशिका

  • सभी जीवधारियों की रचना कोशिका नामक एक संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई से होती है।
  • रॉबर्ट हुक ने 165 में ‘कोशिका’ शब्द नाम दिया।
  • कोशिकाओं से ऊतक, ऊतक से अंग तथा अंगों से अंग तंत्र का निर्माण होता है।
  • सबसे छोटी कोशिका — माइको प्लाज्मा
  • सबसे बड़ी कोशिका — शुतुरमुर्ग का अण्डा

 

प्रोकैरियाटिक कोशिका

  • रचनात्मक रूप से ये सबसे प्रारम्भिक कोशिकाएँ हैं।
  • कोशिका एकल झिल्ली द्वारा आवृत होती है।
  • यह जीवाणुओं, नील हरित शैवाल, तथा माइकोप्लाज्मा में पायी जाती है।
  • प्लाज्मा झिल्ली अर्धपारगम्य होती है।
  • ज्यादातर प्रोकैरियाट्स में छोटे गोलाकार DNA अणु होते हैं। जिन्हें प्लामिड कहा जाता है।

 

यूकैरियाटिक कोशिका

  • प्रोटिस्ट, कवक, पादप तथ जंतुओं में यूकैरियाटिक कोशिकाएं पायी जाती हैं।
  • यूकैरियाटिक कोशिकाएं मुख्यतः प्लाज्मा झिल्ली, जीवद्रव्य तथा इसके कोशिकांग जैसेमाइटोकांड्रिया, इण्डोप्लामिक रेटिकुलम, गाल्जीकाय तथा वास्तविक केन्द्रक से निर्मित होती हैं।

 

कोशिका के घटक

  • कोशिकाभित्ति तथा प्लाज्मा झिल्ली, कोशिका द्रव्य तथा केन्द्रक।
  • कोशिका भित्ति पादप कोशिका में पायी जाती कोशिका भित्ति जन्तु कोशिका में अनुपस्थित होती है।
  • कोशिका झिल्ली लिपिड्स से निर्मित होती है।
  • प्लाज्मा झिल्ली का कार्य है अणुओं का परिवहन करना।
  • लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली कहा जाता है।
  • राइबोसोम्स की खोज सर्वप्रथम पैलेड ने की।
  • स्तनधारी RBC के अतिरिक्त सभी जीवित कोशिकाओं में राइबोसोम्स पाए जाते हैं।
  • केन्द्रक कोशिका के मध्य में स्थित होता है। यह यूकैरियाटिक कोशिका का सबसे बड़ा तथा गोलाकार घटक होता है।
  • माइटोकाण्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा गृह कहा जाता है।

 

कोशिका से सम्बन्धित कुछ खोजें (Some Discoveries Related to Cell)

 

सन्वैज्ञानिकखोज
1781फोन्टानाकेन्द्रिका
1831रॉबर्ट ब्राउनकेन्द्रक
1839पुरकिन्जेजीवद्रव्य (Protoplasm) नाम दिया
1877डब्ल्यू फ्लेमिंगसमसूत्री कोशिका विभाजन की खोज की
1879डब्ल्यू फ्लेमिंगगुणसूत्रो का विभाजन एवं क्रोमेटिन शब्द का प्रतिपादन
1850कोलीकरमाइटोकॉण्डिया
1887बेन्डर्न एवं बोवेरीजाति में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है।
1891कैमेलियो गॉल्जीगॉल्जीकाय
1897सी. बेण्डामाइटोकॉण्डिया नाम दिया
1902डब्ल्यू. एस. सटनन्यूनकारी विभाजन का महत्त्व
1904एफ. मिब्जपादप कोशिका में माइटोकाण्ड्रिया
1905जे. बी. फार्मरअर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) नाम दिया
1909एफ. ए. जॉनसनक्याज्मा का बनना
1933टी. एच. मार्गनआनुवंशिकता में गुणसूत्रों की भूमिका

 

 

आनुवंशिकी

  • आनुवंशिक लक्षणों के पीढ़ी दर पीढ़ी संचरण की विधियों और कारणों के अध्ययन को आनुवंशिकी कहा जाता हैं।
  • ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-1884) को आनुवंशिकी का जनक कहा जाता हैं।
  • जीवों के जो लक्षण बाह्य रूप से दिखाई पड़ते हैं, उन्हें फीनोटाइप कहा जाता है।
  • जीवों के आनुवंशिक लक्षण जो बाह्य रूप से दिखाई नहीं पड़ते हैं परंतु आनुवंशिक स्तर पर उनका अस्तित्व रहता है, जीनो टाइप कहलाते हैं।
  • मेंडल ने प्रयोग के लिए मटर के पौधे का चयन किया।
  • मनुष्य में लिंग निर्धारणः मनुष्य में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं।
  • मनुष्य में शुक्रजनन की प्रक्रिया में अद्र्धसूत्री विभाजन होता है। इसमें दो प्रकार के शुक्राणु बनते हैं- (22 + x) तथा (22 + y)।
  • स्त्री में एक समान अण्डाणु बनते हैं- (22 + x) तथा (22 + x)।
  • निषेचन के समय यदि अण्डाणु x गुणसूत्र वाले शुक्राणु से मिलता है तो युग्मनज में 23वीं जोड़ी xx होगी तथा इससे संतान लड़की होगी। जबकि y गुणसूत्र वाला शुक्राणु, xy गुणसूत्र वाला युग्मनज बनाएगा तथा यह संतान लड़का होगा। इस प्रकार पुरुष गुणसूत्र ही लिंग का निर्धारण करेगा, स्त्री का नहीं ।

 

अन्य जीवधारियों में गुणसूत्रों की संख्या

 

जीवगुणसूत्रों की संख्या
मेंढक26
बिल्ली38
कुत्ता78
घोड़ा64
घरेलू मक्खी12
चूहा40
खरगोश44
कबूतर80

 

 

मानव शरीर से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

 

अस्थियों की कुल संख्या206
सबसे छोटी अस्थिस्टेपिज (मध्य कर्ण में)
सबसे लम्बी अस्थिफीमर (जंघा में)।
कशेरुकाओं की कुल संख्या33
पेशियों की कुल संख्या639
सबसे लम्बी पेशीसारटोरियस
बड़ी आन्त्र की लम्बाई1.5 मीटर
छोटी आन्त्र की लम्बाई6.25 मीटर
यकृत का भार (पुरुष में)1.4 – 1.8 कि. ग्रा.
यकृत का भार (महिला में)1.2 – 1.4 कि. ग्रा.
सबसे बड़ी ग्रन्थियकृत
सर्वाधिक पुर्नरूदभवन की क्षमतायकृत में
सबसे कम पुर्नरूदभवन की क्षमतामस्तिष्क में
शरीर का सबसे कठोर भागदाँत का इनमल
सबसे बड़ी लार ग्रन्थिपैराटिड ग्रन्थि
शरीर का सामान्य तापमान98.4°F (37°C)
शरीर में रुधिर की मात्रा5.5 लीटर
हीमोग्लोबिन की औसत मात्रा (पुरुष)13-16 g/dl
हीमोग्लोबिन की औसत मात्रा (महिला)11.5-14 g/dl
WBCs की संख्या5000 – 10000 / cu mm.
सबसे छोटी WBCलिम्फोसाइट
सबसे बड़ी WBCमोनोसाइट
RBCs का जीवन काल120 दिन
WBC का जीवन काल2-5 दिन
रुधिर का थक्का बनने का समय3-6 मिनट
सर्वग्राही रुधिर वर्गAB
सर्वदाता रुधिर वर्गO
सामान्य रुधिर दाब120/80 Hg
सामान्य नब्ज गति (Pulse rate)

·         जन्म के समय

·         1 वर्ष की उम्र में

·         10 वर्ष की उम्र में

·         वयस्क में

 

·         140 बार- मिनट

·         120 बार- मिनट

·         90 बार-मिनट

·         70 बार-मिनट

हृदय गति72 बार-मिनट
सबसे बड़ी शिराइन्फिरीयर वेनाकेवा
सबसे बड़ी धमनीएब्डोमिनल एरोटा
वृक्क का भार150 ग्राम
मस्तिष्क का भार1220 से 1400 ग्राम
मेरूदण्ड की लम्बाई42-45 cm.
क्रेनियल तन्त्रिकाओं की संख्या12 जोड़े
स्पाइनल तन्त्रिकाओं की संख्या31 जोड़े
सबसे लम्बी तन्त्रिकासिऐटिक
सबसे पतली एवं छोटी तन्त्रिकाट्रोक्लियर
सबसे बड़ी तन्त्रिकाट्राइजिमिनल
सबसे बड़ी कोशिकातन्त्रिका कोशिका
सबसे बड़ी अन्त:स्रावी ग्रन्थिथॉयराइड
आकस्मिक ग्रन्थिएड्रिनल
सबसे छोटी अन्त:स्रावी ग्रन्थिपिट्यूटरी ग्रन्थि
लड़कियों में यौवनावस्था का प्रारम्भ13 वर्ष में
महिलाओं में मासिक धर्म का काल28 दिन
गर्भावस्था की अवधि266-270 दिन

 

 

पोषण (NUTRITION)

पोषण (Nutrition) उन सभी क्रियाओं का कुल योग है। जो भोजन के अन्र्तग्रहण, पाचन, पचे हुए भोजन के अवशोषण और अपचित भोजन के बहिष्कार से सम्बन्धित है। पोषण मुख्यतया दो प्रकार का होता है:

(a) स्वपोषण-जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।

जैसे- सभी हरे पौधे, कुछ एककोशिकीय जीव-युग्लीना, क्लेमाइडोमोनाज, वोल्वॉक्स।

(b) परपोषण-जीव अपने भोजन हेतु अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं। जैसे- परजीवी, मृतोपजीवी तथा कीटाहारी पौधे।

 

भोजन (Food):

भोजन वह पोषक पदार्थ है जो किसी जीव द्वारा वृद्धि, कार्य, मरम्मत और जीवन क्रियाओं के संचालन हेतु ग्रहण किया जाता है। यह विभिन्न पदार्थों का मिश्रण होता है। जिसकी मात्रा एवं उसके अवयव भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

भोजन के अवयव (Components of Food)

  • भोजन के सात मुख्य अवयव निम्नलिखित हैं
  1. कार्बोहाइड्रेट
  2. वसा
  3. प्रोटीन
  4. खनिज लवण
  5. विटामिन
  6. जल

 

  1. कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)
  • कार्बोहाइड्रेट, पोलीहाइड्रोक्सी एल्डिहाइड अथवा कीटोन होते हैं जो C,H, एवं O से बने होते हैं। इनमें C, H एवं O का अनुपात सामान्यतया 1:2:1 होता है।
  • सामान्य सूत्र Cn(H2O)n, n= कार्बन परमाणुओं की संख्या
  • कार्बोहाइड्रेट हमारे शरीर हेतु मुख्य ऊर्जा के स्रोत है। ये ऑक्सीकरण के पश्चात शरीर में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।
  • 1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण 17 किलो जूल ऊर्जा अथवा 4.1 कि. कै. ऊर्जा निकलती है।
  • हमारे भोजन की कुल ऊर्जा में से लगभग 60-80 प्रतिशत ऊर्जा कार्बोहाइड्रेट से आती है।

 

कार्बोहाइड्रेट के प्रकार: – शर्करा अणुओं के आधार पर इन्हें तीन भागों में बाँटा जा सकता है:

(a) मोनोसैकेराइड्स– ये सबसे सरल कार्बोहाइड्रेट हैं। ये केवल एक शर्करा अणु के बने होते हैं। जैसे- ग्लूकोज, फ्रक्टोज, गेलेक्टोज।

(b) डाईसैकेराइड्स– ये मोनोसैकेराइडस की दो इकाइयों के बने होते हैं। जैसे- सुक्रोज (चीनी), माल्टोज, लैक्टोज

(दुग्ध शर्करा)।

(c) पोलीसैकेराइड्स- ये बहुत सी मोनोसैकेराइड इकाइयों के ग्लाइकोसाइडिक बन्ध द्वारा जुड़ने से बनते हैं। जैसे- सैल्यूलोज, स्टार्च (आलू में), ग्लाइकोजन (जन्तु यकृत में), काइटीन (आर्थोपोड्स के कवच), हैलुरिक अम्ल।

 

भोजन में कार्बोहाइड्रेट: – भोजन में पाये जाने वाले कुछ कार्बोहाइड्रेट निम्न हैं:

सैल्यूलोज (Cellulose):

  • यह पौधे की कोशिका भित्ति में पाया जाता है।
  • कपास एवं कागज शुद्ध सैल्यूलोज के बने होते हैं। यह ग्लूकोज का बहुलक है।
  • पशुओं जैसे गाय, भैंस, बकरी आदि में सैल्यूलोज का पाचन होता है परन्तु मनुष्य में इसका पाचन नहीं होता।

 

शर्करा (Sugar)

  • यह मीठा, क्रिष्टलीय, सफेद, जल में घुलनशील पदार्थ हैं। मुख्यतया फलों में पाया जाता है।
  • ग्लूकोज शर्करा की अतिरिक्त मात्रा, यकृत में ग्लाइकोजन के रूप में तथा शरीर के अन्य भागों में वसा के रूप संग्रहित रहती है।
  • यकृत की ग्लाइकोजन, रुधिर में शर्करा का स्तर नियन्त्रित करती है।

 

स्टार्च (Starch)

  • पादप कोशिकाओं का संग्रहित पदार्थ है।
  • रासायनिक रुप से यह एमाइलोज एवं एमाइलोपेक्टिन का मिश्रण है जिनमें इनका अनुपात 1:4 होता है।
  • तनु HCI द्वारा यह ग्लूकोज में अपघटित हो जाता है।

 

कार्बोहाइड्रेट के स्रोत

  • इसके मुख्य स्रोत आलू, फल (केला, आम), अनाज (चावल, गेहूँ, मक्का), शर्करा (शहद, गन्ना, चकुन्दर, जैम) रोटी, दूध आदि हैं।
  • कार्बोहाइड्रेट की अत्यधिक मात्रा लेने से पाचन तंत्रसम्बन्धी रोग हो जाते हैं।
  • कार्बोहाइड्रेट की अत्यधिक मात्रा लेने से बच्चों एवं वयस्कों में मोटापा हो जाता है।

 

  1. वसा (Fats)
  • वसा, वसीय अम्लों एवं ग्लिसरोल से बना यौगिक है। जो कार्बन (C), हाइड्रोजन (H) एवं ऑक्सीजन (O) का बना होता है।
  • इसमें अत्यधिक कैलोरी (ऊर्जा) होती है और ये आवश्यक वसा अम्लों के मुख्य स्रोत हैं।
  • 1 ग्राम वसा के ऑक्सीकरण द्वारा 37 किलो जूल ऊर्जा या 5.65 कि. कै. ऊर्जा उत्पन्न होती है।
  • ये जल में अविलेय एवं एसीटोन, बैन्जीन, क्लोरोफार्म आदि में विलेय होते हैं।
  • यह कोशिकाद्रव्य, कोशिका कला आदि में मुख्य रूप से पायी जाती है। जन्तु वसाएँ अर्द्ध ठोस होती हैं जबकि वनस्पति वसाएँ तरल रूप में होती हैं तथा तेल कहलाती हैं।
  • वसा का अन्तत: हाइड्रोलिसिस, लाइपेज एन्जाइम द्वारा छोटी आंत में होता है।

 

वसा के स्रोत:

  • घी, मक्खन, बादाम, पनीर, अण्ड योक, मांस, सोयाबीन और सभी वनस्पति तेल वसा के मुख्य स्रोत हैं।
  • वसा की अल्पता से त्वचा सूखी हो जाती है।
  • वसा की कमी के कारण वसा में घुलनशील विटामिनों की भी कमी हो जाती है।
  • वसा की अत्यधिक मात्रा के सेवन से मोटापा हो जाता है।
  • कोलेस्ट्रॉल के स्तर में वृद्धि से हृदय रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

 

  1. प्रोटीन (Proteins)
  • प्रोटीन शब्द जे. बर्जीलियस ने 1930 में प्रतिपादित किया था।
  • प्रोटीन अमीनो अम्लों का बहुलक है।
  • प्रोटीन कार्बन (C), हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O) एवं नाइट्रोजन (N) से बनी होती हैं।
  • कुछ प्रोटीनों में गंधक (S), फास्फोरस (P) और लौह (Fe) भी पाया जाता है। प्रोटीनों में लगभग 20 प्रकार के अमीनों अम्ल पाये जाते ।

 

  1. विटामिन (Vitamins)
  • विटामिन शब्द फंक (Funk) ने प्रतिपादित किया था।
  • इन्हें इनकी घुलनशीलता के आधार पर दो भागों में विभाजित किया जाता है:
  • जल में घुलनशील विटामिन: विटामिन B-कॉम्पलैक्स, विटामिन C
  • वसा में घुलनशील विटामिन: विटामिन A, विटामिन D, विटामिन E, विटामिन K

 

शरीर के लिए आवश्यक विटामिन

 

विटामिनरायायनिक नामकमी से होने वाला रोगस्रोत
Aरेटिनालरतौंधीदूध, पालक, सब्जी, मछली-यकृत तेल
B1थायमिनबेरी-बेरीतिल, मूंगफली, छिलके वाली दाल, यकृत, अंडा
B2राइबोफ्लेविनआँखों में जलन, त्वचा का फटना, जिह्वा का फटनाहरी सब्जियाँ, खमीर, दूध, कलेजी
B3पैंटोथेनिक अम्लबुधिमंदता, बाल का सफेद होनादूध, गन्ना, मूंगफली, माँस
B5निकोटिनामाइड या नियासीनपेलाग्रा (त्वचा विकार)माँस, मूंगफली, आलू, टमाटर, पत्तेदार सब्जियाँ
B6पाइरी डॉक्सिनएनीमियाअनाज, माँस
B7बायोटीनबालों का गिरना, शरीर में दर्द, लकवायकृत, माँस, दूध
B12सायनोकाबालामिनपीलियाकलेजी, दूध, फलों का रस
B9फॉलिक अम्लरक्ताल्पता, आंत्र विकारहरी सब्जियाँ, सेम, दाल,

यकृत

Cएस्कॉर्बिक अम्लदंत विकार, स्कर्वीआंवले, नींबू, टमाटर
Dकैल्सिफेरालसूखा रोग (बच्चों में) आस्टियोपोरेसिस (वयस्क में)दूध, अंड़ा, मछली यकृत तेल
Eटोकोफेरालयौन क्षमता में कमीदूध, मक्खन, अंकुरित गेहूँ पत्तेदार सब्जियाँ
Kफिलोक्विनोनरक्त का थक्का न बननाहरी सब्जियाँ, आंवला, टमाटर

 

 

  1. खनिज लवण (Mineral Salts)
  • धातु, अधातु एवं उनके लवण खनिज लवण कहलाते हैं।
  • ये हमारे शरीर का लगभग 4% भाग बनाते हैं।
  • खनिज लवण दो प्रकार के होते हैं:
  • वृहत्त पोषक(Macronutrients): इन तत्त्वों की शरीर को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। उदाहरण- Ca, P, K, S, Na, CI और Mg
  • सूक्ष्म मात्रिक (Micronutrients): इन तत्त्वों की शरीर को बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती हैं। उदाहरण- I, Fe, Co, F, Mo और Fe

 

प्रमुख खनिज लवण तथा शरीर में उनके कार्य

 

खनिज लवणस्रोतकार्य
सोडियमसाधारण नमक, सब्जी, माँस तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थद्रव संतुलन, तंत्रिका आवेग का संचरण पेशियों का संकुचन
क्लोराइडसाधारण नमक, दूध, अनाज, प्रसस्कृत खाद्य पदार्थअमाशय में अम्ल संतुलन्, द्रव संतुलन
पोटैशियमताजे फल व सब्जियाँ, दूध, मांस, अनाज तथा दालेंशरीर में वैद्युत अपघट्य संतुलन, तंत्रिका आवेग का संचरण, पेशीय संकुचन
कैल्शियमसब्जियाँ, दूध, पनीर, अनाज, रागी, मछलीहड्ड्यिों व दाँतों को दृढ़ता प्रदान करना,  रुधिर के थक्का बनने में सहयोग करना
फॉरफोरसदूध, मछली, अंडे, माँस, प्रसंस्कृत भोज्य पदार्थहड्डियों तथा दाँतों को मजबूती प्रदान करना, अम्ल एंव क्षार में संतुलन स्थापित  करना
मैग्नीशियमसूखे मेवे, बीज, दालें, हरी पत्तीदार सब्जियाँ, समुद्री भोज्य पदार्थप्रोटीन निर्माण, पेशियों में संकुचन, तंत्रिका आवेग संचरण में सहायक, प्रतिरक्षा प्रणाली में विकास
सल्फर

 

दूध, अंडे, सूखे मेवे, प्रोटीन, माँस, दालें, मछलीप्रोटीन के लिए महत्वपूर्ण
लौहमछली, दालें, सूखे मेवे, पालक, ऊत्फीय अंडे, माँसलाल रक्त कोशिकाओं में वृधि,  ऑक्सीकरण में सहायक
आयोडीनसमुद्री भोज्य पदार्थ, आयोडीन युक्त नमक, दूध से निर्मित भोज्य पदार्थथायरॉक्सिन हार्मोन के संश्लेषण में सहायक

 

 

  1. जल (Water)
  • यह एक अकार्बनिक पदार्थ है।
  • मानव शरीर में लगभग 65% जल होता है।
  • यह पसीने एवं वाष्पन द्वारा शरीर का ताप नियन्त्रित करता है।
  • यह पाचन, परिवहन एवं उत्सर्जन में सहायक है।
  • इसके मुख्य स्रोत उपापचयी जल, तरल भोजन और पीने का जल है।
  • इसकी कमी से निर्जलीकरuण (Dehydration) हो जाता है।

 

पाचन तंत्र (Digestive System)

मनुष्य एवं अन्य जन्तुओं में जन्तुसम पोषण (Holozoic nutrition) पाया जाता है।

 

  1. भोजन का अन्र्तग्रहण (Ingestion of Food)
  • भोजन का पोषण आहारनाल में होता है। यह पोषण निम्न चरणों में होता है-
  • भोजन मुखगुहा द्वारा लिया जाता है।
  • यह दाँतों द्वारा छोटे छोटे टुकड़ों में काटा जाता है तथा लार के साथ मिश्रित किया जाता है।
  • अन्तर्ग्रहण मुख गुहा (Buccal cavity) में होता है। लार ग्रन्थियाँ भोजन को गीला करके, भोज्य कणों को समूह में लाकर लुगदी बना देती हैं।
  • लार ग्रन्थि में स्टार्च को तोड़ने वाला एन्जाइम टायलिन (Ptyalin) पाया जाता है।

 

  1. भोजन का पाचन (Digestion of Food)
  • संयुक्त एवं अघुलनशील भोज्य कणों को सरल, घुलनशील एवं अवशोषण योग्य भोज्य कणों में परिवर्तन की क्रिया पाचन (Digestion) कहलाती है।

 

(a) मुखगुहा में पाचन: मुखगुहा में स्टार्च पर लारीय एमाइलेज कार्य करता है।

 

 

(b) आमाशय में पाचन

  • भोजन ग्रासनली (Oesophagus) से होकर आमाशय में प्रवेश करता है।
  • अब भोजन आमाशयी रस एवं हाइड्रोक्लोरिक अम्ल में मिलता है जो भोजन को जीवाणु रहित एवं माध्यम को अम्लीय बना देता है।
  • पेप्सिन प्रोटीन का पाचन करके उन्हें पेप्टोन्स में परिवर्तित कर देता है।
  • रेनिन दूध को दही में परिवर्तित करता है।
  • अब पचित भोजन (Chyme) काइम कहलाता है।

 

(c) छोटी आंत में पाचन

  • काइम, ग्रहणी (Duodenum) में पहुँचता है।
  • भोजन पित्तरस (यकृत से स्रावित) से मिलता है जो वसा को छोटी गोलियों (Small globules) में तोड़ देता है।
  • ट्रिप्सिन, प्रोटीन पर कार्य करके उसे पेप्टाइड में तोड़ देता है।
  • एमाइलेज स्टार्च को सरल शर्करा में परिवर्तित कर देता है।
  • लाइपेज, वसा को वसा अम्लों एवं ग्लिसरोल में परिवर्तित कर देता है।
  • भोजन, इलियम (lleum) में पहुँचकर आंत रस से मिलता है।
  • माल्टेज, माल्टोज को ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता है।
  • लेक्टेज, लेक्टोज को ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता है।
  • सुक्रेज, सुक्रोज को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • ट्रिप्सिन, पेप्टाइडस का अमीनो अम्लों में पाचन करता है।
  • अब भोजन काइल (Chyle) कहलाता है।

 

  1. पचे हुए भोजन का अवशोषण एवं श्वांगीकरण
  • इलियम (Ilium) की आन्तरिक सतह पर अंगुलीनमा उभार पाये जाते हैं जिन्हें विलई (vili) कहते हैं। ।
  • प्रत्येक विलई पर रुधिर वाहिनियों (Blood capillaries) और लिम्फ वाहिनियों (Lymph capillaries) का जाल बिछा होता है जो भोजन के अवशोषण में सहायता करता है।

 

  1. अनावश्यक भोजन का बहिष्करण
  • पच हुआ भोजन बड़ी आंत में प्रवेश करता है।
  • बड़ी आंत भोजन का अवशोषण नहीं कर सकती लेकिन जल का अवशोषण करती है। शेष बचा हुआ ठोस वज्र्य पदार्थ विष्ठा (Faeces) कहलाता है और मलाशय (Rectum) में पहुंचता है।
  • यह मलद्वार (Anus) के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

 

पाचक रसइंजाइमभोज्य पदार्थअंतिम उत्पाद
लारटायलिनस्टार्चमाल्टोज
जठर रसएमाइलाप्सिनस्टार्च, ग्लाइकोजनमाल्टोज तथा ग्लूकोज
आंत्रीय रससुक्रोज, माल्टेज, लैक्टेजसुक्रोज, माल्टोज, लैक्टोजग्लूकोज, फ्रक्टोज तथा गैलेक्टोज
जठर रसपपेप्सिन, रेनिनप्रोटीन, कैसीनप्रोटी-योजेज तथा पेप्टोन कैल्सियम कैसिनेट
अग्नाशय रसट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिनप्रोटीन, पेप्टाइड, कार्बोक्सीलप्रोटियोजेज तथा पेप्टाइड्स, पेप्टाइड्स अमीनो अम्ल

 

परिसंचरण तंत्र

  • रुधिर के परिसंचरण में हृदय, धमनियाँ, शिराएँ तथा रुधिर मुख्य भूमिका निभाते हैं।
  • मानव हृदय चारवेष्मीं होता हैं- दायाँ आलिंद, बायाँ आलिंद, दायाँ निलय व बायाँ निलय।
  • हृदय के दायाँ भाग में अशुद्ध रक्त तथा बायाँ भाग में शुद्ध रक्त होता हैं।
  • कोरोनरी धमनी हृदय की मांसपेशियों को रक्त पहुँचाती हैं, इस धमनी में जब किसी प्रकार का व्यवधान पहुँचता है तो हृदय आघात (Heart attack) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • हृदय द्वारा रुधिर परिसंचरण का मार्ग निम्न प्रकार होता है।
  • बायाँ आलिंद → बायाँ निलय → दैहिक महाधमनी → विभिन्न धमनियों में → छोटी धमनियों में →धमनी कोशिकाएँ → अंग → अग्र एवं पश्च महाशिरा → दाहिना आलिंद → दाहिना निलय → पल्मोनरी धमनी → फेफड़ा → पल्मोनरी शिरा → बाएँ आलिंद।
  • हृदय के सिसटोल एवं डायस्टोल के सम्मिलित रूप को धड़कन कहा जाता है। सामान्य मनुष्य में यह एक मिनट में 72 बार तथा भ्रूणावस्था में 150 बार धड़कता है।
  • थायरॉक्सिन एवं एड्रीनलिन नामक हार्मोन हृदय की धड़कन को प्रभावित करते हैं।

 

तन्त्रिका तंत्र

  • ये तंत्रमानव के शरीर में होने वाली क्रियाओं का नियमन एवं नियन्त्रण करता है।
  • मस्तिष्क, मेरू-रज्जू तथा तन्त्रिकाएँ इस तंत्र के अंग है।
  • मस्तिष्क (Brain) तन्त्रिका तंत्रका सर्वप्रथम अंग है।
  • मस्तिष्क को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

 

(a) वृहत मस्तिष्क (Cerebrum): – यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है। यह इच्छा शक्ति, स्मरण शक्ति, अनुभव, सुनना, देखना, सुँघना, बोलने तथा शरीर में चेतना के कार्यों को नियंत्रित करता है।

 

(b) लघु मस्तिष्क (Cerebellum): – यह शरीर को संतुलित तथा माँसपेशियों के कार्यों को नियंत्रित करता है।

 

(c) मेड्यूला ऑबलोन्गेटा (Medulla Oblongata): –यह कशेरुक दण्ड (Vertebral Column) के न्यूरल के नाल में प्रवेश करने के बाद मेरू रज्जु (Spinal cord) कहलाता है तथा हृदय की धड़कन, पाचन अंगों एवं श्वसन अंगों के कार्यों को नियंत्रित करता है।

आँखों की पलकों का झपकना एक अनैच्छिक (Involuntary) क्रिया है। औसतन हर 6 सेकण्ड में एक बार पलक झपकती है।

आँसू का निकलना एक प्रतिवर्ती (Reflexive)क्रिया हैं।

 

मस्तिष्क के विभिन्न भागों के कार्य

 

      भागकार्य
अग्रमस्तिष्क (डाइएनसेफेलान)हार्मोन की निरंतरता बनाए रखना एवं संपूर्ण शरीर को नियंत्रित करना।
घ्राण पिण्डगंध का ज्ञान करना।
प्रमस्तिष्क अग्रपिण्डवाणी, चेहरे की मांसपेशियों की क्रियाशीलता तथा उच्च मानसिक क्रियाएं सुनना।
टेम्पोरल पिण्डद्रश्य।
पेरिएटल पिण्डभूख, प्यास, थकान, निद्रा, शरीर का तापमान, संवेदन तथा भावनाएं आदि का नियंत्रण।
मध्य मस्तिष्कअग्र तथा पश्च मस्तिष्क का संयोजन करना, दृश्य तथा श्रवण उद्दीपनों के प्रति सिर, गर्दन तथा धड़ की प्रतिवर्ती गति का नियंत्रण करना।
पश्च मस्तिष्कमुद्रा, संतुलन तथा मांसपेशियों में सामंजस्य स्थापित करना।
सेरिबेलमश्वसन का नियंत्रण करना।
पॉस वेरोलाइहृदय गति, श्वसन गति को नियंत्रित करना।
मेड्यूला आबलांगाटारुधिर दाब, निगलना, खांसी, छींकना, तथा उल्टी करना आदि क्रियाओं को नियंत्रित करना।

 

श्वसन तंत्र (Respiratory System)

  • श्वसन एक ऑक्सीकारक (Oxidising) एवं ऊर्जा प्रदान करने वाली प्रक्रिया है जिसमें जटिल कार्बनिक यौगिकों के टूटने से सरल कार्बनिक यौगिक बनते हैं।
  • श्वसन, श्वसन अंगों द्वारा होता है।
  • श्वसन अंग भिन्न-भिन्न जन्तुओं में भिन्न-भिन्न होते है।
  • फेफड़े (Lungs): मनुष्य, मेंढक, पक्षी, छिपकली एवं पशु इत्यादि।
  • त्वचा (Skin): मेंढक, केंचुआ।
  • गिल (Gills): मेंढक का लारवा, मछली, प्रॉन।
  • श्वसन नाल (Trachea): कीट।
  • सामान्य शरीर सतह (General body Surface): अमीबा, यूग्लीना इत्यादि।

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वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration)

  • वह प्रक्रिया जिसमें श्वसन क्रियाधर (Respiratory substrate) का ऑक्सीकरण, ऑक्सीजन की उपस्थिति में CO2, H2O एवं ऊर्जा में होता है।
  • C6H12O6 + 6O2 —→  6CO2 +6H2O+ 686 कि. कै.
  • ग्लूकोज के एक अणु से पाइरुविक अम्ल के 2 अणुओं का निर्माण होता है। यह प्रक्रिया. ग्लाइकोलिसिस कहलाती है।
  • ग्लाइकोलिसिस, कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में होती है।
  • पाइरुविक अम्ल के ऑक्सीकरण से ऊर्जा + CO2 + H2O निकलता है (क्रेब्स चक्र)।
  • 1 ग्लूकोज अणु = 36 ATP यूकैरियोटिक कोशिका में
  • 1 ग्लूकोज अणु = 38 ATP प्रोकैरियोटिक कोशिका में

 

 

मनुष्य में श्वसन (Respiration in Humans)

  • मनुष्य में श्वसन दो चरणों में होता है|
  • बाह्य श्वसन (Breathing): फेफड़ों में वायु का आवागमन
  • अन्तः श्वसन (Internal respiration): भोजन का ऑक्सीकरण
  • बाह्य श्वसन (Breathing) में वायु का नि:श्वसन (Inspiration) एवं उच्व सन (Expiration) होता है।

 

नि:श्वसन (Inspiration)

  • इस प्रक्रिया में वायु अन्दर ली जाती है जिससे डायफ्रॉम की पेशियाँ संकुचित होती हैं एवं डायफ्रॉम समतल (Flattened) हो जाता है।
  • निचली पसलियाँ बाहर एवं ऊपर की ओर फैलती हैं। छाती फूल जाती है, फेफड़ों में वायु का दाब कम हो जाता है, वायु फेफड़ों की ओर बहती है।

 

उच्दवसन (Expiration)

  • वायु बाहर निकाली जाती है।
  • डॉयफ्राम एवं पसलियों की पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। तथा डॉयफ्राम फिर से गुम्बद के आकार (Dome shaped) हो जाता है। छाती संकुचित होती है तथा वायु बाहर की ओर नाक एवं वायुनाल द्वारा निकलती है।
  • मनुष्य एक मिनट में 14-18 बार सांस लेता है।

 

अन्तः श्वसन (Internal Respiration)

  • यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें भोजन के ऑक्सीकरण से ऊर्जा निकलती है।
  • यह जैव रासायनिक (Biochemical) प्रक्रिया है जो कोशिका में होती है।

 

संवेदी अंग (Sense Organs)

 

नेत्र:

ये प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती है। मानव नेत्र लगभग 10 लाख वर्गों का भेद कर सकते हैं।

इनकी संरचना में मुख्यतः तीन भाग होते हैं –

  1. स्क्लेरॉटिक स्तर: – यह अस्थियुक्त बाह्य परत होती है जिसमें निम्न भाग शामिल हैं

(i) कार्निया: यह गुम्बदाकार ऊतक से निर्मित होता है। यह नेत्र के सामने वाले भाग को आवृत करता है।

(ii) कंजक्टिवा: यह नेत्र के ऊपरी पलक की अविरलता है।

 

  1. कोरॉयड स्तर: यह मध्य परत होती है। तथा इसकी संरचना में निम्न भाग होते हैं-

(i) नेत्र तारा (Pupil): यह परितारिका (iris) के मध्य में एक काला छिद्र होता है। प्रकाश की मात्रा के अनुसार यह अपने आकार में परिवर्तन करता रहता है।

(ii) पक्ष्माभी पेशियाँ: ये लेंस के वक्रता को नियंत्रित करती हैं।

(iii) परितारिका (Iris): यह नेत्र का रंगीन भाग होता है। यह नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा का निर्धारण करता है। इसमें नेत्र तारा सहयोग करता है।

(iv) लेंस: यह उभयोत्तल, पारदर्शी तथा वृताकार होता है। इसकी स्थिति परितारिका के पीछे होती है। इसका फोकस रेटिना पर होता है।

 

  1. रेटिना (दृष्टिपटल): – यह प्रकाश संवेदी ऊतक होता है जो नेत्र के पश्च भाग में स्थित होता है। इसमें लाखों प्रकाश संग्राही (शलाका एवं शंकु) कोशिकाएं होती हैं।
  • ये कोशिकाएँ प्रकाश किरणों को वैद्युत उद्दीपन में परिवर्तित कर देती हैं। इस उद्दीपन को दृष्टि तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क में दृष्टि केंद्र में भेजा जाता है।
  • रेटिना पर बनने वाला प्रतिबिम्ब वास्तविक तथा उल्टा होता है।
  • शलाका कोशिकाएँ मंद प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती हैं। इसमें रोडॉप्सिन नामक वर्णक पाए जाते हैं जो गुलाबी बैंगनी रंग के होते हैं।
  • रात्रिकाल में देखने के लिए शलाका कोशिकाएँ ही सहायक होती हैं, शंकु कोशिकाएँ नहीं।
  • शंकु कोशिकाएँ तेज प्रकाश में संवेदनशील होती हैं इसलिए ये रंगों में विभेद करने में सक्षम होती हैं।
  • फोबिया सेंट्रलिस एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ दृष्टि सबसे ज्यादा स्पष्ट होती है।
  • अंध बिंदु वह स्थान है जहाँ शंकु तथा शलाका कोशिकाएँ नहीं पायी जाती हैं अतः यहाँ कोई प्रतिबिम्ब नहीं बनता है।

 

दृष्टिदोष तथा उपचार

मायोपिया (निकट दृष्टिदोष): इस दोष से पीड़ित व्यक्ति दूर की वस्तु को स्पष्ट नहीं देख पाता है परंतु नजदीक की वस्तु को साफ देख सकता है।

कारण: नेत्र गोलक बड़ा होता है जिससे प्रतिबिम्ब रेटिना से पहले ही बन जाता है। नेत्रगोलक के सापेक्ष लेंस की वक्रता ज्यादा होती है। पक्ष्माभि पेशियों में ज्यादा फैलाव के कारण होता है।

उपचार: अवतल लेंस के उपयोग द्वारा।

 

हाइपरमेट्रोपिया (दूर दृष्टिदोष): – इस दोष से पीड़ित व्यक्ति नजदीक की वस्तु को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता है परंतु दूर की वस्तु को स्पष्ट देख सकता है।

कारण: नेत्रगोलक छोटा होने के कारण प्रतिबिम्ब रेटिना से परे बनता है।

  • कार्निया में पर्याप्त वक्रता नहीं होती है।
  • नेत्र का लेंस नेत्र में काफी पीछे होता है।
  • नेत्र लेंस के फोकस दूरी में वृधि के कारण।
  • पक्ष्माभि पेशियों के कठोरता के कारण।

 

उपचार: उत्तल लेंस के उपयोग द्वारा।

 

कर्ण (Ear)

  • कर्ण सुनने एवं सन्तुलन बनाने में सहायक है।
  • कर्ण को निम्न तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

(a) बाह्य कर्ण (कर्ण पल्लव + बाह्य कर्ण कुहर)

(b) मध्य कर्ण (कर्णपटह गुहा)

(c) अन्तः कर्ण (मेम्ब्रेनस लेबिरिंथ)

 

(a) बाह्य कर्ण (External ear)

  • बाह्य कर्ण, कर्ण पल्लव से नालाकार गुहा को होता हुआ कर्णपटह (Tympanic membrane) तक फैला

होता है।

कर्ण पल्लव ध्वनि तरंगों का संग्रह करती है।

कर्ण कुहर (Auditory meatus) की दीवार में कर्ण मोम या सेरुमिनस ग्रन्थियाँ होती हैं।

सेरुमिनस ग्रन्थियों से स्रावित होने वाला मोम जैसा पदार्थ कर्ण पटह को चिकना बनाये रखता है तथा बाह्य कणों को अन्दर प्रवेश करने से रोकता है।

 

(b) मध्य कर्ण (Middle Ear)

  • कर्णपटह कला (Tympanic membrane) मध्य कर्ण को बाह्य कर्ण से पृथक करती है।
  • मध्य कर्ण की तीन कर्ण अस्थिकाएँ ।
    • मैलियर्स (Malleus): बाहरी एवं हथौड़ी सदृश।
    • इन्कस (Incus): मध्य में एवं निहाई के की।
    • स्टेपीज (Stapes): आन्तरिक तथा रकाब आकार की यह एक ओर इन्कस से तथा ओर फेनेस्ट्रा ओवेलिस पर मढ़ी झिल्ली से लगी रहती है। स्टेपीज मानव शरीर की सबसे छोटी अस्थि (1.2 mg) है।
  • मध्यकर्ण गुहा एक यूस्टेकीयन नलिका (Eustachian tube) द्वारा नासाग्रसनी में खुलती है। इसके कारण कर्ण पटह के भीतर एवं बाहर दोनों ओर हवा का दबाव एक समान रहने से उसके फटने का डर नहीं रहता।

 

(c) अन्तः कर्ण (Internal Ear)

  • लेबिरिंथ दो मुख्य भागों का बना होता है। अस्थिमय लेबिरिंथ (Bony labyrinth) तथा कलागहने लेबिरिंथ (Membranous labyrinth)
  • अस्थिमय लेबिरिंथ परिलसीका (Perilymph) द्रव से भरा होता है जबकि कलागहन लेबिरिंथ अन्त लसिका (Endolymph) से भरा होता है।
  • कलागहन लेबिरिंथ सन्तुलन एवं सुनने से सम्बन्धित है।
  • अन्त:कर्ण तीन भागों का बना होता है
  • काय (यूट्रिकुलेस तथा सैकुलस-(Utriculus She and Succulus)
  • अर्धवृत्ताकार नलिकाएँ (Semicircular canals)
  • कॉक्लिया (Cochlea)
  • कॉक्लिया छोटी घोंघा (Snail) सदृश संरचना है। यह खरगोश में 2½ कुण्डल द्वारा तथा मनुष्य में 2¾ कुण्डल द्वारा बना होता है। कॉक्लिया में तीन कक्ष स्केला वेस्टिबुलाई, स्केला मीडिया तथा स्केला टिम्पैनाई होते हैं।
  • स्केला मीडिया में कॉर्टी का अंग (Organ of Corti) पाया जाता है। जिसकी खोज एल्फेन्सो कार्टी ने की थी। यह मस्तिष्क से जुड़ा होता है।

 

नाक (Nose)

  • नाक गंध ग्रहण करने वाला संवेदी अंग है।
  • नासावेश्मों की दीवार घ्राण उपकला की बनी होती है।
  • घ्राण कोशिकाएँ लम्बी, पतली एवं तर्क रूप होती हैं।
  • घ्राण कोशिकाएँ स्वाद कोशिकाओं की तुलना में अधिक रसायन संवेदी होती हैं।
  • घ्राण संवेदनाओं जैसे मिर्च, क्लोरोफार्म, अमोनिया आदि से आँसू निकल आते हैं।
  • कुत्ते तीव्र घ्राण संवेदी होते हैं।
  • कुत्ते विभिन्न मनुष्यों की पहचान इसलिए कर लेते हैं। क्योंकि इनमें विभिन्न मनुष्यों की गंध में अन्तर करने की क्षमता होती है।
  • मॉथ, तितली आदि की एन्टीना में घाण रसायन संवेदांग होते हैं।

 

जीभ (Tongue)

  • स्वाद के लिए जीभ की सतह पर स्वाद कलिकाएँ होती हैं।
  • जीभ पर स्वाद कलिकाएँ बहुत अधिक होती हैं।
  • मनुष्य में चार विभिन्न प्रकार के स्वाद जीभ के विभिन्न भागों द्वारा अनुभव किए जाते हैं :
  • मीठा: जीभ के अग्र छोर पर।
  • नमकीन: अग्र स्वतंत्रसिरे के पाश्र्व पर।
  • खट्टा: पश्च पाश्र्वो में।
  • कड़वा: पश्च भाग में।
  • कई कार्बनिक पदार्थ जैसे क्यूनीन, मार्फीन, कैफीन यूरिया आदि कड़वा स्वाद रखते हैं।

 

उत्सर्जन तंत्र

  • शरीर में होने वाली उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप कुछ अपशिष्ट पदार्थों की उत्पत्ति होती है जिनका शरीर से निष्कासित होना आवश्यक है। इसमें सहायक प्रणाली को उत्सर्जन तंत्र कहते हैं जिसमें निम्न भाग होते हैं –

(i) वृक्क (ii) त्वचा (iii) यकृत (iv) फेफड़ा।

 

(i). वृक्क

  • इसके बाहरी भाग को कार्टेक्स तथा भीतरी भाग मेड्यूला कहा जाता है। प्रत्येक वृक्क लगभग एक करोड़ वृक्क नलिकाओं से बना होता है। इन रचनाओं को नेफ्रॉन कहा जाता है। ये वृक्क की क्रियात्मक इकाई हैं। इसमें एक थैलीनुमा संरचना होती है जिसे बाउमैन कैप्सूल कहा जाता है।
  • प्रति मिनट लगभग 125 ml रुधिर का निस्पंदन (fittration) होता है।
  • सामान्य मूत्र में जल 95%, लवण 2% यूरिया 2.7% व यूरिक अम्ल 0.3% पाया जाता है। यूरोक्रोम वर्णक के कारण मूत्र का रंग हल्का पीला होता है। इसका pH मान 6 होता है।

 

(ii). त्वचा: इसमें पायी जाने वाली स्वेद ग्रंथियाँ पसीने का स्राव करती हैं।

(iii). यकृत: इसमें पायी जाने वाली कोशिकाएँ अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित कर देती हैं।

(iv). फेफड़े: इसके द्वारा कार्बन डाईऑक्साइड तथा जलवाष्प का उत्सर्जन होता है।

 

  • अमोनिया के उत्सर्जन की प्रक्रिया को अमोनोटेलिज्म कहा जाता है। अमोनिया का उत्सर्जन करने वाले जीव अमोनोटेलिक कहलाते हैं। जैसे- टैडपोल, मुलायम शरीर वाले अकशेरुकी तथा टेलियॉस्ट मछलियाँ इत्यादि।

 

कंकाल तंत्र (Skeletal System)

  • कंकाल तंत्र में अस्थियाँ तथा उनसे सम्बन्धित संरचनाएं सम्मिलित हैं जो शरीर का ढाँचा बनाती हैं। और उसे निश्चित आकार प्रदान करती हैं। अस्थियों को कंकाल तंत्रका अंग (Organ) कहा जाता है।
  • मानव शरीर में कुल 206 अस्थियाँ होती हैं। इन अस्थियों को पाँच वर्गों में विभाजित किया जाता है।

 

  1. खोपड़ी (Skull): – खोपड़ियों की अस्थियों की संख्या 8 होती है। इसे क्रेनियम (Cranium) भी कहा जाता है।

 

  1. चेहरे की अस्थियाँ (Facial Bones): – इनमें 14 अस्थियाँ होती हैं।

 

  1. धड़ की अस्थियाँ (Trunk Bones): – इन अस्थियों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कशेरुक दण्ड (Vertebral Column) होता है। कशेरुक दण्ड में अस्थियों की संख्या 33 होती है। इसी कशेरुक दण्ड के अन्दर एक नली होती है जिसमें मेरू रज्जु (Spinal Cord) होता है। छाती की अस्थियों में 24 पसलियाँ होती हैं।

 

  1. हाथ की अस्थियाँ (Hand Bones): – हाथ की प्रमुख अस्थियों में स्केपुला, रेडियस तथा अलना हैं।

 

  1. पैरों की अस्थियाँ (Leg Bones): – पैरों की प्रमुख अस्थियों में पटेला, टार्सस, फीम टिबिया, फिबुला आदि हैं। फीमर शरीर की लम्बी अस्थि होती है।

 

 

अस्थि संधियाँ

दो अस्थियों के मिलन को संधि कहा जाता है। जहाँ उनके बीच सभी प्रकार की गति होती है।

 

चल संधियाँ: इस प्रकार की संधियों में अस्थियों के बीच गुहा पायी जाती है। इन्हें मुख्यतः निम्न 5 भागों में विभाजित किया गया है

  • फिसलन संधि: यह संधि कार्पल्स के बीच पायी जाती है। इसमें सभी दिशाओं में केवल फिसलन गति होती है।
  • कब्जेदार संधि: यह घुटने में पायी जाती है।
  • धूरी संधि: यह एटलस तथा अक्षीय कशेरु के बीच पायी जाती है।
  • सैडल (काठी) संधि: यह कार्पल तथा मेटाकार्पल के मध्य पायी जाती है।
  • बॉल तथा सॉकेट संधि: यह पूमरस तथा अंशमेखला के बीच पायी जाती है।

 

रुधिर परिसंचरण तंत्र (Blood circulatory System)

रुधिर परिसंचरण तंत्र के प्रकार

(a) खुला परिसंचरण तंत्र (Open circulatory system)

  • रुधिर कुछ समय के लिये रुधिर नलिकाओं में उपस्थित रहता है तथा अन्त में रुधिर नलिकाओं से खुले स्थान में आ जाता है।
  • इस प्रकार का रुधिर परिसंचरण तिलचट्टा, प्रॉन, कीट, मकड़ी आदि में पाया जाता है।
  • रुधिर कम दाब एवं कम वेग से बहता है।
  • तिलचट्टे (Cockroach) में रुधिर परिसंचरण चक्र 5-6 मिनट में पूर्ण होता है।

 

(b) बन्द परिसंचरण तंत्र (Closed circulatory system)

  • यह केंचुएँ, नेरिस, मोलस्क एवं सभी कशेरुकियों में पाया जाता है।
  • रुधिर बन्द नलिकाओं में बहता है।
  • रुधिर अधिक दाब एवं अधिक वेग से बहता है।
  • पदार्थों का आदान-प्रदान ऊतक द्रव्य द्वारा होता है।

 

रक्त

  • यह एक प्रकार का संयोजी ऊतक है।
  • यह रक्त कणिका, प्लाज्मा तथा प्लेटलेट्स से निर्मित होता है।
  • इसकी प्रकृति क्षारीय (pH 7.4) होती है।
  • वयस्क में इसकी मात्रा 5.8 ली. होती है।
  • ऑक्सीकृत या शुद्ध रक्त का रंग चमकदार लाल होता है।
  • अनॉक्सीकृत रक्त का रंग बैंगनी आभा लिए होता है।
  • ऊँचाई पर रहने वाले लोगों में रक्त की मात्रा अधिक होती है तथा निम्न क्षेत्र में रहने वाले लोगों में कम। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऊँचाई पर रहने वाले लोगों को ऑक्सीजन की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है।
  • रक्त के थक्का बनने की क्रिया में फ्राइबीनोजन थ्रॉम्बीन के द्वारा फाइबीन में परिवर्तित हो जाता है। यह थ्रॉम्बीन कैल्सियम आयन की उपस्थिति में थ्रॉम्बोप्लास्टीन से प्राप्त होता है।
  • स्त्रियों में हीमोग्लोबिन की मात्रा 13.5-14.5 तथा पुरुषों में 14.5-15.5 प्रतिशत होती है।
  • भ्रूण में इसकी मात्रा 23 ग्रा. प्रति 100 मिली ली. होती है।

 

रक्त वाहिनी: ये तीन प्रकार की होती हैं

  • धमनी: इनकी दीवार मोटी होती है तथा ये हृदय से रक्त शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचाती हैं।
  • इनमें कपाट नहीं होते हैं। तथा ये शरीर के भीतरी भाग में पायी जाती है।
  • पल्मोनरी धमनी में अनॉक्सीकृत रक्त प्रवाहित होता है जबकि शेष धमनियों में ऑक्सीकृत (शुद्ध) रक्त प्रवाहित होता है। धमनियों में प्रवाहित रक्त की चाल अधिक होती है तथा दाब भी अधिक होता है।
  • शिराएँ: इनकी दीवार अपेक्षाकृत पतली होती हैं।
  • ये शरीर के विभिन्न भागों से रुधिर लेकर हृदय को पहुँचाती हैं।
  • रुधिर के पश्च बहाव को रोकने के लिए इनमें कपाट होते हैं। इनमें रुधिर चाल तथा दाब कम होता पल्मोनरी शिरा के अतिरिक्त सभी शिराओं में अशुद्ध (अनाक्सीकृत) रुधिर का बहाव होता है।
  • रक्त वाहिनियाँ: ये बहुत ही पतली रक्त वाहिनियाँ होती हैं। जो धमनियों से शिराओं को जोड़ती हैं।
  • कोशिकाओं तथा रक्त के मध्य पोषक तत्व, गैस तथा उत्सर्जी पदार्थों आदि के विनियम में सहायक होती हैं।

 

रुधिर समूह (Blood Group)

1902 ई. में नोबेल पुरस्कार विजेता कार्ल लैंडस्टीनर ने रुधिर समूहों की खोज की। मनुष्यों में चार रुधिर समूह होते हैं: A, B, AB, O. O समूह का रुधिर किसी भी मनुष्य को दिया जा सकता है, इसे सर्वदाता (Universal Donor) कहते हैं। AB संमूह सभी रुधिर समूहों से रुधिर ग्रहण कर सकता है, इसे सर्वग्राही (Universal Recipient) कहते हैं।

 

रक्त आधान (Blood Transfusion)

 

रक्त समूहरक्तदाता वर्गरक्त प्राप्तकर्ता वर्ग
AA,OA,AB
BB,OB,AB
ABA,B,AB,OAB
OOA,B,AB,O

 

Rh factor

  • Rh एक प्रकार का एन्टीजन होता है जो लाल रुधिर कोशिकाओं में पाया जाता है।
  • जिस मनुष्य के शरीर में यह पाया जाता है वह Rh+ एवं जिसके शरीर में नहीं पाया जाता है वह Rh कहलाता है।
  • भारत में लगभग 97% लोग Rh+ के हैं। यदि किसी Rh वाले व्यक्ति को Rh+ वाले व्यक्ति का रुधिर दे दिया जाये तो उसकी मृत्यु हो जायेगी।

 

जनक तथा उनकी संतति में रक्त प्रकार

 

जनक में रक्त प्रकाररक्त संतति में सम्भावित प्रकार
O x OO
O x AO, A
O x BO, B
O x ABA, B
A x AA, O
A x BO, A, B, AB
A x ABA, B, AB
B x BB, O
B x ABA, B, AB
AB X ABA, B, AB

 

रक्त कोशिकाएँ

 

एरिथ्रोसाइट्स (RBCs)

  • इन्हें लाल रक्त कोशिका कहा जाता है। इनमें हीमोग्लोबीन पाया जाता है।
  • ये आक्सीजन वितरण में सहायक होती हैं।
  • रक्त में इनकी मात्रा अधिक होती है।
  • स्तनधारी जीवों में पायी जाने वाली RBCS में केन्द्रक तथा कोशिकांग का अभाव होता है।
  • परंतु ऊँट तथा इलामा में RBC केन्द्रक युक्त होती है।
  • एक RBC में हीमोग्लोबीन के 280 अणु पाएजाते हैं।

 

ल्यूकोसाइट्स (WBCs)

  • इन्हें श्वेत रक्त कोशिका भी कहा जाता है।
  • ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का एक भाग हैं। ये जीर्ण तथा अनावश्यक कोशिकाओं को शरीर से बाहर निकालती हैं। संक्रमणकारी तत्वों से लड़ती हैं।
  • RBCs की तुलना में WBCs की संख्या बहुत ही कम होती है। (600:1)

 

थ्राम्बोसाइट्स

  • रक्त के थक्का बनने के लिए यह उत्तरदायी होता है।
  • यह फाइब्रिनोजन को फाइब्रिन में परिवर्तित करता है।

 

प्लाज्मा तथा लिम्फ की तुलना

 

क्र.सं.प्लाज्मालिम्फ
1इसमें 92% जल, 7.8% रक्त प्लाज्मा प्रोटीन तथा अन्य पदार्थों की अति अल्प मात्रा होती है।इसमें विभिन्न प्रकार के पदार्थ होते हैं जैसे प्रोटीन, लवण ग्लूकोज, वसा, जल तथा wbcs
2यह कोशिका रहित रक्त का ही भाग होता है। इसमें लवण, पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन तथा शरीर के अन्य आवश्यक घटक होते हैं।यह रूपांतरित संयोजी ऊतक हैं। इसमें लिम्फोसाट्स मानोसाइट्स, लवण, अल्प मात्रा में प्रोटीन होता है। यह रंगहीन होता है।
3इसका प्रवाह रक्त वाहिनियों में होता है।इनका प्रवाह केवल लिम्फैटिक वाहिकाओं में होता है।
4कई पदार्थों के परिवहन के द्वारा यह पोषण, उत्सर्जन तथा श्वसन में भाग लेता है। एंटीबॉडी उत्पन्न करके यह शरीर की सुरक्षा प्रक्रिया में सहायकरक्त आपूर्ति को छोड़कर यह पोषक पदार्थों को ऊतक तक पहुँचाता है। सुरक्षा प्रणाली तथा वसा अवशोषण में यह भाग लेता है।
5फाइब्रिनोजन तथा प्रोथॉम्बिन की उपस्थिति के कारण, इनमें थक्का बनने की क्षमता होती है।इनमें यक्का बनने की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है क्योंकि इसमें इन दोनों की मात्रा बहुत कम होती है।

 

 

रक्तदाब (Blood Pressure)

  • हृदय के बार-बार पम्पिंग करने से रक्त वाहिनियों पर पड़ने वाले रक्त के दबाव को रक्तदाब कहा जाता है। इसका मापन स्फीग्मोमैनोमीटर द्वारा होता है।
  • शरीर के कुछ खास स्थानों पर इसका अनुभव किया जा सकता है। रक्तदाब को सिस्टॉलिक/डायस्टॉलिक के रूप में रिकार्ड किया जाता है।
  • सामान्य व्यक्ति में रक्तदाब 120/80 mm Hg होता है।
  • आयु, हृदय कार्य क्षमता तथा सम्पूर्ण परिधीय प्रतिरोधकता जैसे कारक रक्त दाब को प्रभावित करते हैं।
  • हाइपर टेंशन (उच्च रक्त दाब) – 150/90 mm Hg. हाइपोटेंशन (निम्न रक्त दाब)– 100/50 mm Hg.
  • इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ (E.C.G) का प्रयोग इलेक्ट्रोड्स की सहायता से हृदय की उचित कार्य प्रणाली की जाँच की जाती है।

 

हृदय (Heart)

  • हृदय एक मोटा, पेशीये, संकुचनशील स्वत: पम्पिंग अंग है। इसका वह भाग जो शरीर के ऊतकों से रुधिर ग्रहण करता है अलिन्द (Auricle) कहलाता है तथा हृदय का वह भाग जो ऊतकों में रुधिर पम्प करता है, निलय (Ventricle) कहलाता है।
  • मछलियों में केवल दो कोष्ठीय (Two chambered) हृदय पाया जाता है जिसमें एक अलिन्द एवं एक निलय होता है।
  • उभयचरों (Amphibians) में तीन कोष्ठीय (Three chambered) हृदय होता है।
  • सरीसृपों का हृदय संरचना में तीन कोष्ठीय तथा कार्य में चार कोष्ठीय (Four chambered) होता है।
  • पक्षियों एवं स्तनियों में हृदय चार कोष्ठीय होता है। जिसमें दो अलिन्द एवं दो निलय होते हैं।

 

मानव हृदय (Human Heart)

  • सभी मनुष्यों का हृदय लगभग समान आकार का होता पुरुषों में हृदय का औसत वजन 280-340 ग्राम तथा महिलाओं में 230-280 ग्राम होता है।
  • नवजात शिशु के हृदय का वजन लगभग 20 ग्राम होता है।
  • हृदय, वक्ष गुहा (Thoracic cavity) में दोनों फेफड़ों के मध्य स्थित होता है।
  • हृदय के चारों ओर द्विकलायुक्त कोष पाया जाता है। यह कला पेरीकार्डियम कहलाती है।
  • दोनों कलाओं के मध्य पेरीकार्डियल द्रव से भरी एक गुहा पायी जाती है।
  • पेरीकार्डियल द्रव हृदय की धक्कों से सुरक्षा करता है।

 

हृदय की संरचना (Structure of Heart): – मनुष्य का हृदय चार कोष्ठीय होता है जिसमें दो अलिन्द एवं दो निलय पाये जाते हैं।

 

दायाँ अलिन्द (Right atrium/auricle)

  • इसमें सुपीरियर वेनाकेवा (Superiorvenacava) एवं इन्फीरियर वेनाकेवा (Inferior venacava) से अनॉक्सीकृत रुधिर आता है।
  • दायाँ अलिन्द, दायें निलय में एक चौड़े, वृत्तीय दायें अलिन्द निलय छिद्र (Auriculoventricular aperture) द्वारा खुलता है जो ट्राइकस्पिड वाल्व (Tricuspid valve) द्वारा ढका होता है।
  • ट्राइकस्पिड वाल्व, दायें अलिन्द से दायें निलय की ओर रुधिर के एक दिशीय प्रवाह को नियन्त्रित करता है।

 

दायाँ निलय (Right ventricle)

  • इससे फुफ्फुस धमनी (Pulmonary artery) निकल कर फेफड़ों में पहुँचती है जिसमें अनॉक्सीकृत (Deoxygenated blood) प्रवाहित होता है।

 

बायाँ अलिन्द (Left atrium/auricle)

  • इसमें फुफ्फुस शिरा (Pulmonary vein) के द्वारा फेफड़ों से ऑक्सीकृत रुधिर (Oxygenated bicod) आता है। इनमें वाल्व अनुपस्थित होते हैं।
  • बायाँ अलिन्द, बायें निलय में, बायें अलिन्द-निलय छिद्र (Auriculoventricular aperture) द्वारा खुलता अलिन्द-निलय छिद्र वाइकस्पिड वॉल्व अथवा मिट्रल वाल्व द्वारा ढका रहता है।
  • बाइकस्पिड वाल्व बायें अलिन्द से बायें निलय में रुधिर के विपरीत प्रवाह को रोकता है।

 

बायाँ निलय (Left ventricle)

  • इससे बड़ी रुधिर नलिका निकलती है जिसे एरोटा (Aorta) कहते हैं।
  • एरोटा शरीर के विभिन्न भागों में ऑक्सीकृत रुधिर प्रवाहित करती है।
  • मानव हृदय का सबसे मोटा भाग दायें निलय की भित्ति है।

 

अन्तः स्रावी तंत्र (Entlnerine System)

 

अन्तः स्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands)

  • इन ग्रन्थियों में अपने स्राव को लक्ष्य अंगो तक ले जाने हेतु नलिकाएँ नहीं होती हैं।
  • अन्त: स्रावी ग्रन्थियों से सम्बन्धित विज्ञान एण्डोक्राइनोलॉजी कहलाता है।
  • इनके स्राव (हार्मोन) का परिवहन रुधिर द्वारा होता हैं। उदाहरण- थायरॉइड, पिट्यूटरी, हाइपोथैलेमस, एड्रिनल आदि।

 

बहि: स्रावी ग्रन्थियाँ (Exocrine Gland)

  • इन ग्रन्थियों में नलिकाएँ (Ducts) होती हैं।
  • ये अपना स्राव इन नलिकाओं में स्रवित कर लक्ष्य तक पहुँचाती हैं। उदाहरण- त्वचा की स्वेद ग्रन्थियाँ एवं तेल ग्रन्थियाँ, लार ग्रन्थियाँ, यकृत आदि।

 

हार्मोन (Hormones)

  • ये अन्त:स्रावी ग्रन्थियों से अल्प मात्रा में स्रावित होने वाले कार्बनिक पदार्थ हैं।
  • ये जैव उत्प्रेरकों के रूप में कार्य करते हैं। अत: ये शरीर की क्रियाओं को प्रेरित करते हैं। उनकी गति को बढ़ा देते हैं अथवा घटा देते हैं।
  • ये सूचना के प्रथम वाहक अणु (Messenger molecule) होते हैं।
  • ये अन्तः वातावरण को नियन्त्रित करते हैं तथा अन्य हार्मोनों की क्रिया को अनुमति प्रदान करते हैं।
  • हार्मोन की खोज बेलेस (Bayliss) और अर्नेस्ट एच. स्टर्लिंग (Ernst H. Starling) ने सिक्रिटीन हार्मोन के रूप में की थी।

 

अन्तःस्रावी तंत्र: हार्मोन्स तथा उनके कार्य

 

क्र.सं.अन्तःस्रावी ग्रंथिहार्मोन्सकार्य
1.पीयूष ग्रंथिवृदधि हार्मोन्स ADH, ACTHअस्थियों की वृद्धि को नियंत्रित करना, जलावशोषण को नियंत्रित करना, ठण्डी तथा गर्मी से शरीर की सुरक्षा करना, अण्डाशय में फालिकल्स की वृद्धि करना
2.पिनियल ग्रंथिमेलाटोनिनलैंगिक चक्र तथा त्वचा के वर्ण को नियंत्रित करना
3.थायरॉयडथायरॉक्सीनउपापचय तथा वृद्धि दर को नियंत्रित करना। कम स्राव होने पर वजन का बढ़ना तथा थकान होना, अधिक स्राव होने पर वजन कम तथा सक्रियता का अधिक होना
4.थायमसथायमोसिनलिम्फोसाइट्स के उत्पादन में मदद करना।
5.एड्रिनलकार्टिसोनप्रोटीन को शर्करा में रूपांतरित करने में सहायक
6.अग्न्याशयइंसुलिनशर्करा उपापचय को नियंत्रित करना, इंसुलिन के कम स्रावित होने पर रुधिर में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है तथा कमजोरी प्रतीत होती है (इसे मधुमेह कहा जाता है)
7.अण्डाशयएस्ट्रोजनलैंगिक लक्षण का प्रकट होना। जैसे- लड़कियों में स्तन का विकसित होना।
8.वृषणटेस्टोस्टेरानपुरुषोचित लक्षणों का प्रकट होना जैसे लड़कों में दाढ़ी, मूंछ का उगना

 

जनन-तंत्र (Reproductive System)

  • वह प्रक्रिया जिसमें जनकों से नये जीवों की उत्पत्ति होती है जनन कहलाती है।
  • जनन दो प्रकार का होता है।
  • अलैंगिक जनन में केवल एक जनक भाग लेता है। तथा युग्मकों का निमार्ण नहीं होता है लिंग कोशिकाओं का सम्बन्ध नहीं रहता।
  • लैंगिक जनन में दो जनक भाग लेते हैं तथा युग्मकों का निर्माण एवं संलयन होता है।
  • जनन की इकाई अगुणित युग्मक (Haploid gametes) होते हैं।
  • जन्तुओं में अलैंगिक जनन निम्न प्रकार होता है।
  • विखण्डन (Fission): अमीबा, युग्लीना, जीवाणु, क्लेमाइडोमोनाज
  • मुकुलन (Budding): स्पंज, हाइड्रा, यीस्ट, एनिलीड, ट्यूनिकेटस
  • खण्डन (Fragmentation): स्पाइरोगायरा, प्लेनेरिया, कृमि
  • सिनगेमी (Syngamy) में एक ही जनक अथवा विभिन्न जनकों से उत्पन्न युग्मकों का संलयन होता है। उदाहरण- टीनिया, कॉकरोच, मेंढक, मानव।
  • संयुग्मन (Conjugation) में दो जनकों में अस्थायी संयुग्मन होता है। उदाहरण- पैरामीशियम

 

 

नर जनन तंत्र (Male Reproductive System)

  • वृषण, वृषणकोष के अन्दर बन्द रहते हैं।
  • एपिडिडाइमिंस, सेमीनीफेरस ट्यूब्यूल्स (Seminiferous tubules) के जुड़ने से बनी कुण्डलित नलिका है।
  • शिशन (Penis) पेशीय अंग है जिसमें रुधिर आपूर्ति अत्यधिक होती है।
  • नर में स्पर्मेटोजोआ (Spermatozoa) 13-14 वर्ष की उम्र में बनने प्रारम्भ हो जाते हैं तथा पूरी उम्र बनते हैं।
  • शरीर पर बालों का उगना स्कूलाइन नर लिंग हार्मोन (Male sex hormones) के कारण होता है।

 

नर जनन अंगसंख्याकार्य
वृषण (Testes)2शुक्राणु एवं टेस्टोस्टीरोन का निर्माण
शुक्र नलिका (Sperm duct)2वृषण से (Urethra) तक शुक्राणुओं का परिवहन
शुक्राशय (Seminal vesicle)2सेमीनल प्लाज्मा का स्रावण
एपिडिडाइमिस (Epididymis)2अस्थाई रूप से शुक्राणुओं का संग्रह करता है।
मूत्र मार्ग (Urethra)1मूत्र एवं शुक्राणुओं का परिवहन करता है।
प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostrate gland)2वीर्य हेतु क्षारीय द्रव का स्रावण
काऊपर ग्रन्थि (Cowper’s gland)2क्षारीय श्वेत द्रव का स्रावण
शिशन (Penis)1मादा जनन छिद्र में शुक्राणु पहुँचाता है।

 

 

मादा प्रजनन तंत्र (Female Reproductive System)

  • वयस्कता के पश्चात अण्डाशय में प्रत्येक 28 दिन के अन्तराल पर अण्डाणु (Ovumor egg cell) बनता है।
  • विकसित हो रहा भ्रूण माता से ऑवल (Placenta) द्वारा जुड़ा होता है यह भ्रूण को रुधिर आदि की आपूर्ति करता है।
  • गर्भाशय में भ्रूण 9 महीने तक विकास करता है।
  • यह काल गर्भावस्था (Gestation period) कहलाता है।
  • विकास के पश्चात बच्चा गर्भाशय से बाहर निकलता है। और माँ बच्चे को दूध द्वारा पोषित करती है।
  • महिलाओं में जनन क्षमता 10-14 वर्ष की उम्र में प्रारम्भ होकर मैनोपोज (Menopause) तक रहती है।
  • मैनोपोज का औसत समय 52 वर्ष है।
  • योनि से आर्तव चक्र (Menstrual cycle) के दौरान रुधिर स्राव रजोधर्म (Menstruation) कहलाता है।
  • आर्तव (मासिक) चक्र की सामान्य अवधि 28 दिन होती है। यह गर्भावस्था के दौरान अनुपस्थित होता है तथा मैनोपोज के दौरान पूर्ण रूप से बन्द हो जाता है।
  • महिलाओं के दोनों अण्डाशयों से एक वर्ष में लगभग 13 परिपक्व अण्डाणु बनते हैं।

 

मासिक चक्र

  • एक स्त्री का प्रजनन काल यौवनारंभ (10-14 वर्ष) से लेकर रजोनिवृति (40-50 वर्ष) तक रहता है।
  • प्रथम रजोदर्शन को मेनार्क कहा जाता है।
  • रजोनिवृति में अण्डोत्सर्ग तथा मासिक स्राव का विराम हो जाता है।
  • औसतन मासिक चक्र 28 दिनों में पूर्ण होता है।
  • गर्भावस्था के समय मासिक चक्र अवरुद्ध हो जाता है।
  • दुग्धपान के काल में यह आंशिक या पूर्णतः बाधित रहता है।
  • एक वर्ष में लगभग 13 पूर्णतः विकसित अण्डाणु अण्डाशय से मुक्त होते हैं।
  • मासिक चक्र का नियंत्रण FSH, LH एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरॉन आदि हार्मोंस द्वारा होता है।

 

मादा जनन अंगसंख्याकार्य
अण्डाशय (Ovany)2हार्मोन एवं अण्ड निर्माण
अण्डवाहिनी (Oviduct)2अण्डाणु (Ova) को गर्भाशय में पहुँचाना
गर्भाशय (Uterus)1गर्भस्थ शिशु हेतु स्थान प्रदान करना
योनि (Vagina)1शुक्राणु प्राप्त करना

 

 

गभर्नरधिक उपाय (Contraception Methods)

  • गर्भनिरोध: शुक्राणु का अण्डाणु से सलयन होने से रोकना।
  • प्राकृतिक गर्भनिरोध: अण्डोत्सर्ग के दौरान सहवास (Copulation) न करना।
  • यान्त्रिक गर्भ निरोध: शुक्राणु को अण्डाणु के संलयन से रोकने के लिए विभिन्न उपकरणों का उपयोग जैसे: कॉण्डम, IUD आदि।
  • रासायनिक गर्भनिरोध: विभिन्न दवाएँ, शुक्राणु को मारने वाली क्रीम, टिकिया (Tablets) तथा फोम आदि।
  • पुरुष नसबन्दी (Vasactomy): मनुष्य की शुक्रवाहिनी एवं शुक्राशय को काटकर अलग करना।
  • महिला नसबन्दी (Tubectomy): महिलाओं की फैलोपियन नलिका को काटकर अलग करना।

 

एम्नियोसेन्टेसिस (Amniocentesis): – यह एक तकनीक है जो गर्भस्थ शिशु में गुणसूत्रीय असामान्यताओं की जाँच हेतु प्रयोग की जाती है। इन असामान्यताओं की जाँच एम्नियोटिक द्रव में कोशिकाओं के विश्लेषण द्वारा की जाती है। इस तकनीक का दुरुपयोग गर्भस्थ शिशु के लिंग की जाँच करने में भी किया जाता है।

 

परखनली शिशु (Test tube baby): – बच्चा जो उस अण्डाणु से विकसित हुआ है जिसका निषेचन कृत्रिम रूप से (शरीर से बाहर) करके महिला के गर्भाशय में आगे के विकास हेतु डाला गया है। परखनली शिशु कहलाता है।

 

रोग तथा उनके कारक

 

प्रोटोजोआ द्वारा होने वाली बीमारियाँ

 

रोगरोगाणु
मलेरिया (पेचिस)प्लाज्मोडियम
अमीबियासीसएंटमीबा हिस्टोलिटिका
जियार्डियासिसजियार्डिया लाम्बिया
स्लीपिंग सिकनेस (निद्रा रोग)ट्राइपैनोसोमा
लिशमैनिसलिशमानिया
ट्राइकोमोनियासिसट्राइकोमोनास वैजिनैलिस

 

कवक द्वारा होने वाली बीमारियाँ रोग

 

रोगरोगाणु
एसपरजिलेसिसएसपरजिलस फ्यूमिगाटुओ
कैंडिडियासिसकैंडिडा एल्बिसेंस
दादट्राइकोप्लाइटान
ब्लास्टोमाइकोसिसब्लास्टो माइसिज डमैटिटाइडिस

 

जीवाणुओं द्वारा होने वाली बीमारियाँ

 

रोगरोगाणु
डिसेंट्री (पेचिस)शिजेला
प्लेगपाश्च्यूरेल्लापेस्टिस
डिप्थेरियाकोरिने बैक्टिरियम डीप्थेरियाई
हैजावाइब्रियो कालेराइ
ट्यूबर कूलोसिसमाइकोबैक्टिरियम ट्यूबरकुलोसिस
टिटनसक्लास्ट्रिडियम टिटैनी
काली खांसीबारडिटेल्ला परट्यूसिस
कुष्ठमाइको बैक्टिरियम लेप्री
एंथ्रेक्सबैसिलस एंथ्रासिस
वील्स रोगलेप्टोस्पीरा

 

विषाणुओं द्वारा होने वाली बीमारियाँ

 

रोगरोगाणु
रेबिजरेबिज विषाणु
डेंगूडेंगू विषाणु
इंफ्लूएंजाइंफ्लूएंजा विषाणु
खसरारुबिओला विषाणु
जर्मन खसरारुबेला विषाणु
मम्प्स (कर्ण शूल)मम्प्स विषाणु
बड़ी मातावेरीसेल्ला जोस्टर
छोटी मातावेरिथोला विषाणु
पोलियोपोलियो विषाणु
चिकुनगुनियाचिकुनगुनिया विषाणु
बर्ड फ्लूH5N1 विषाणु
स्वाइन फ्लूH1N1 विषाणु

 

 

आविष्कार तथा उनके आविष्कारक

 

वर्षआविष्कारआविष्कारक
1882चिपकने वाली प्लास्टर पट्टीपाल बियर्सडार्फ
1846निश्चेतकविलियम मार्टन
1881एंथ्रेक्स टीकालूइस पाश्चर
1865प्रति जैविकजोसेफ लिस्टर
1969कृत्रिम हृदयडेंटन कूले
1972कृत्रिम कूल्हाजॉन चानेले
1979कृत्रिम त्वचाडॉ. जॉन. एफ. बुर्क तथा आयोनिस यन्नास
1674जीवाणु (खोज)एंटान वान ल्यूवनहाक
1960गर्म निरोधक गोलियांग्रेगरी पिंकस, जानरॉक मिनचूइ चांग
1628रक्त संचरण (खोज)विलियम हार्वे
1818रक्त आधानडॉ. थॉमस ब्लडेल
1880हैजे का टीकालूइस पाश्चर
1887कांटेक्ट लेंस (कांच)एलोल्फ फिक
1905कार्निया प्रत्यारोपणएडुअर्ड जिर्म
1847कफ सिरपजेम्स स्मिथ तथा पुत्र
1864दंत छिद्रण (मोटर चलित)जॉर्ज फेलोस हैरिंगटन
1956डिसपोजेबल सूईकोलिन मरडोक
1953DNA संरचनाफ्रांसिस क्रिक, जेम्स वाटसन तथा रोजालिण्ड फ्रैंकलिन
1903इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफविलियम इन्थोवेन
1912गैस मास्कगैरेट आगस्टस मार्गन
1865आनुवंशिकताजॉन ग्रेगर मेडल
1967हृदय प्रत्यारोपणक्रिस्चियन बर्नार्ड
1853हाइपोडर्मिक सिरिंजचार्ल्स गौब्रिल प्रवाज तथा एलेक्जेंडर उड
1921इंसुलिनफ्रेडरिक बांटिग तथा चार्ल्स वेस्ट
1929लौह फेफड़ाफिलिप ड्रिकर
1590सूक्ष्मदर्शी (यौगिक)हैंस जानसन
1803माफीनफ्रेड्रिक विलहेम, एडम सर्टनर
1851आपथैल्मोस्कोपचार्ल्स बैवेज, हरमन लडविग वान हेल्महोल्ट्स
1960पेसमेकर (मनुष्य)विल्सन ग्रेटबैच
1864पाश्चुरीकरणलूइस पाश्चर
1761पैथोलॉजी (निदान)जियोवानी बाटिस्ता मार्गागनी
1928पेनिसिलिनएलेक्जेंडर फ्लेमिंग
1940प्लास्टिक सर्जरीआर्किबाल्ड हेक्टर मैक इण्डो
1953पोलियो टीकाजोनास साल्क
1820क्विनीनपियरे जोसेफ पेलेटियर तथा जोसेफ बिनेम कैवेनटाऊ
1885रेबीज टीकालूइस पाश्चर
1966रुबेला टीकापाल डी. पार्कमैन तथा हैरों एम मेयर
1753स्कर्वी टीकाजेम्स लिड
1796छोटी माता टीकाएडवर्ड जेनर
1819स्टेथोस्कोपरेने लिनेक
1866थर्मामीटर(चिकित्सा)थॉमस एल्लबट्ट
1895एक्स रे -किरणविल्हेम रॉटेजन

 

 

जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाएँ

 

एंथोलॉजीपुष्पों का अध्ययन
एपिकल्चरमधुमक्खी पालन
एस्ट्रोनामीआकाशीय पिण्डों का अध्ययन
एयरोनॉटिक्सवायुयान उड़ान का अध्ययन
कार्डियोलाजीहृदय का अध्ययन
क्रायोजीनिक्सअत्यधिक निम्न तापक्रम की उपयोगिता का अध्ययन
जेनेटिक्सआनुवंशिकता का अध्ययन
साइटोलॉजीकोशिकाओं का अध्ययन
जेरांटोलाजीवृद्धावस्था का अध्ययन
माइकोलॉजीमांसपेशियों का अध्ययन
न्यूरोलाजीतंत्रिका तंत्र का अध्ययन
फिजियोलॉजीजीवों के विभिन्न भागों तथा उनके कार्यों का अध्ययन
आक्सटेट्रिक्सगर्भावस्था में प्रयुक्त दवाओं का अध्ययन
पीसीकल्चरविभिन्न प्रकार की मछलियों का अध्ययन
टेक्सोनामीजीवों के वर्गीकरण का विज्ञान
फ्लोरीकल्चरपुष्प उत्पादन का विज्ञान
इवालूशनपृथ्वी पर जीवन-उत्पत्ति का अध्ययन
पेडोलॉजीमृदा संघटन का अध्ययन
पैथोलॉजीरोगाणुओं का अध्ययन

 

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