Plant Kingdom

पादपों का वर्गीकरण

 

पादप जगत

  1. थैलोफाइटा
  2. ब्रायोफाइटा
  3. टेरिडोफाइटा
  4. जिम्नोस्पर्म
  5. एंजियोस्पर्म

 

  1. थैलोफाइटा
  • इस समूह के पौधों का शरीर जड़, तना एवं पत्ती आदि में विभक्त नहीं होते हैं।
  • संवहन ऊतक का अभाव होता है।
  • उदाहरण- शैवाल (क्लोरेला, बेलोनिया,फोरफाइरा, अल्बा आदि), कवक (आल्टरनेरिया, ट्राइकोडर्मा, राइजोपस, म्यूकर आदि), जीवाणु (स्ट्रेप्टोमाइसीज ग्रीसीअस, राइजोबियम, एनाबीना आदि)

 

  1. ब्रायोफाइटा
  • इसमें स्थलीय तथा जलीय अनुकूलता पायी जाती है।
  • स्फगम नामक मॉस (फ्यूनेरिया) में जल अवशोषण की अधिक क्षमता पायी जाती है; अतः इनका उपयोग पादप नर्सरी में किया जाता है।

 

  1. टेरिडोफाइटा
  • इस समूह के पौधे नमी तथा छायादार वाले स्थानों पर उगते हैं।
  • इनका शरीर जड़, तना, शाखा एवं पत्तियों में विभेदित रहता है।
  • इनके तने को सामान्यतः राइजोम कहते हैं।
  • इनमें संवहनीय ऊतक विकसीत होते हैं परंतु जाइलम में वाहिनी तथा फ्लोएम में सहकोशिकाएँ नहीं होती हैं।

 

  1. जिम्नोस्पर्म (नग्नबीजी)
  • इनके पौधे सामान्यतः झाड़ी या लता के रूप में पाए जाते हैं।
  • इनकी जड़ें पूर्णतः विकसित होती हैं।
  • परागण की क्रिया वायु की सहायता से होती हैं।
  • ये ज्यादातर मरूभिद होते हैं।
  • ये काष्ठीय बहुवर्षी और लम्बे होते हैं।
  • उदाहरण- साइकस, सिकोया, पाइनस आदि।

 

  1. एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी)
  • इस समूह के पौधों में बीज फल के अंदर होते हैं।
  • बीजपत्रों की संख्या के आधार पर इनको दो वर्गों में विभाजित किया गया है- एक बीजपत्री तथा द्विबीजपत्रीं।
  • एक बीजपत्री पौधों के बीजों में केवल एक बीजपत्र होता है। उदाहरण- गेहूँ, मक्का, धान इत्यादि।
  • द्विबीज पत्री पौधों के बीजों में दो बीज पत्र होते हैं। उदाहरण- सरसों, मूली, कपास, भिण्डी आदि ।
  • पुष्प पादप के प्रजनन भाग होते हैं। इसमें बाह्य दलपुंज (calyx), दलपुंज (Corolla), पुमंग (Androecium) तथा जायांग (Gynoecium) पाए जाते हैं।
  • पुमंग नर भाग होता है तथा जायांग स्त्री भाग। पुमंग पुंकेसर से निर्मित होता है जो परागकणों को धारण करता है।
  • जायांग अण्डप से निर्मित होता है तथा अण्डप के तीन भाग होते हैं (1) अण्डाशय, (2) वर्तिका, (3) वर्तिकाग्र
  • परागकोष से परागकण का निकलकर अण्डप के वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण कहलाता है।
  • वर्तिकाग्र से परागकण का परागनली के रूप में आगे बढ़ते हुए बीजांडकाय में स्थित भूणपोष तक पहुँचता है। यहाँ अण्डकोशिका से संयोग करके निषेचन की क्रिया को संपन्न करता है।
  • आवृतबीजी में निषेचन त्रिक संलयन तथा अन्य पादपों में द्विसंलयन होता है।
  • पार्थेनोकाप: अनिषेचन की स्थिति में अण्डाशय से फल का बनना पार्थेनोकाप कहलाता है। इस प्रकार के बने फलों में सामान्यतः बीजों का अभाव होता है। उदाहरण- अंगूर, पपीता, केला इत्यादि।

 

पादपों की विशेषताएँ

  • ज्यादातर पादप यूकैरियाटिक होते हैं तथा इनमें पर्णहरित (Chlorophyll) पाया जाता है।
  • पादप कोशिका भित्ति सेल्युलोज की बनी होती है।
  • पादपों में अंग तथा अंग तंत्र पाया जाता है।
  • प्रकाश संश्लेषण के द्वारा इन्हें सूर्य से ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • इनमें लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों प्रकार का प्रजनन होता है।
  • जंतुओं, कवकों तथा अन्य पादपों से सुरक्षा के लिए इनमें सुरक्षात्मक प्रणाली होती है।

 

प्रकाश संश्लेषण

  • प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया मिजोफिल कोशिकाओं में घटित होती है जिसमें क्लोरोप्लास्ट (पर्णहरित) पाया जाता है।
  • प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया दो चरणों में संपन्न होती है

(i) प्रकाश रासायनिक क्रिया

(ii) प्रकाशहीन रासायनिक क्रिया

 

  • प्रकाश रासायनिक क्रिया: इसे हिलन क्रिया भी कहते हैं जो क्लोरोफिल के ग्रेना भाग में संपन्न होती है।

 

  • प्रकाशहीन रासायनिक क्रिया: इस क्रिया में कार्बन डाई ऑक्साइड का अपचयन होकर शर्करा व स्टार्च का निर्माण होता है। यह क्रिया क्लोरोफिल के स्ट्रोमा में होती है।
  • यह आक्सीकरण-अवकरण की प्रक्रिया है। जिसमें जल का ऑक्सीकरण होता है तथा CO2 अपचयित होकर कार्बोहाइड्रेट में रूपांतरित हो जाता है।
  • CO2 को कार्बोहाइड्रेट में अपचयित होने के लिए ATP तथा NADPH2 से ऊर्जा मिलती है।

 

श्वसन

  • कार्बोहाइड्रेट ऑक्सीकृत होकर ऊर्जा उत्पन्न करता है जिसका उपयोग कोशिकाएं करती हैं। इस प्रक्रिया को श्वसन कहा जाता हैं।
  • श्वसन तीन चरणों में संपन्न होता है-
  • ग्लाइकोलाइसिस,
  • क्रेब्स चक्र तथा
  • इलेक्ट्रान परिवहन तंत्र
  • कोशिका के जीवद्रव्य में ग्लाइकोलाइसिस होता है जिसका अंतिम उत्पाद पाइरुबेट है। जिसका परिवहन जीवद्रव्य से माइटोकांड्रिया में होता है।
  • साइट्रिक अम्ल चक्र, क्रेब्स चक्र माइटोकांड्रिया के मैट्रिक्स में घटित होता है।
  • वाष्पोत्सर्जन पौधों के पत्तियों के छोट-छोटे छिद्रों (पर्ण रन्ध्र) से जलवाष्प के रूप में जल क्षति को वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।

 

नाइट्रोजन उपापचयन

  • पौधे नाइट्रोजन की प्राप्ति मिट्टी से नाइट्राइट, (NO2) नाइट्रेट (NO3) तथा अमोनियम (NH4) लवण के रूप में करते हैं।
  • नाइट्रोजन स्वांगीकरण की क्रिया पादपों में तीन चरण में पूर्ण होती है- (i) अमोनीकरण (ii) नाइट्रीकरण (iii) विनाइट्रीकरण

 

अमोनीकरण

  • इस क्रिया में प्रोटीन जैसे जटिल कार्बनिक यौगिक, अमोनीकारी जीवाणुओं की उपस्थिति में अमोनिया मे रूपांतरित हो जाते हैं।
  • प्रोटीन → अमीनो अम्ल → कार्बनिक अम्ल → अमोनिया

 

नाइट्रीकरण

  • अमोनिया सर्वप्रथम नाइट्राइट फिर नाइट्रेट में रूपांतरित होती है। इस प्रक्रिया को नाइट्रीकरण कहते हैं। इसमें नाइट्रोसोमोनास तथा नाइट्रोबैक्टर नामक जीवाणु महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 

विनाइट्रीकरण

  • इस प्रक्रिया में मृदा तथा जल में उपस्थित नाइट्रेट लवण गैसीय नाइट्रोजन में रूपांतरित होकर वायुमंडल में वापस आ जाते हैं। इस प्रक्रिया में स्यूडोमोनास नामक जीवाणु सहायक होते हैं।

 

पादप हार्मोन

  1. ऑक्जिंस यह वृदधि को नियंत्रित करता है। इसकी खोज सन् 1880 में डार्विन ने की थी। यह पत्तियों के विलगन को रोकता है। यह शीर्ष वृधि को प्रेरित करता है।

 

  1. जिबरेलिंस: सन् 1926 में इसकी खोज जापानी वैज्ञानिक कुरोसावा ने की थी। यह बौने पौधे को लम्बा करता हैं। पुष्पन को तीव्र करता है। काष्ठीय पौधे के कैम्बियम की सक्रियता को बढ़ाता है।

 

  1. साइटोकाइनिन: यह पौधों में जीर्णता को रोकता है। RNA तथा प्रोटीन निर्माण में सहायक होता है। यह कोशिका विभाजन तथा विकास को प्रेरित करता है।

 

  1. एबसिसिक एसिड: यह वृधिरोधक हार्मोन है। इसके प्रभाव से बीज सुषुप्तावस्था में बने रहते हैं। पत्तियों में विलगन को प्रेरित करता है। पुष्पन की प्रक्रिया को अवरूद्ध करता है।

 

  1. एथिलीन: यह फलों को पकाता है। मादा पुष्पन को बढ़ाता है। यह गैसीय रूप में पाए जाने वाला हार्मोन है।

 

एक बीजपत्री पौधे: ऐसे पौधे जिनके बीज में सिर्फ एक बीजपत्र होता हैं। जैसे –

 

पादप कुलपौधे
लिलिएसीलहसुन, प्याज
पाल्मीनारियल, ताड़, खजूर तथा सुपारी
ग्रॅमिनेसीमक्का, गेहूँ, गन्ना, ज्वार, बाजरा

 

द्विबीजपत्री पौधे: ऐसे पौधे जिनके बीज में दो पत्र होते हैं। जैसे –

पादप कुलपौधे
क्रूसी फेरीरालजम, मूली,सरसों
 मालवेसीगुड़हल, भिण्डी, कपास
लेग्यूमिनेसीचना, मटर, उरद, बबूल, इमली
कम्पोजिटीगेंदा, डहेलिया, सलाद, सूरजमुखी
रुटेसीनीबू, चकोतरा, संतरा
कुकरबिटेसीलौकी, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज
सोलेनेसीधतूरा, टमाटर, मिर्च, आलू, बैंगन
रोजेसीस्ट्राबेरी, बादाम, सेब

 

जड़ों का रुपांतरण: मूली, गाजर, शलजम, चुकंदर इत्यादि।

 

तनों का रुपांतरण: प्याज, अदरक, हल्दी, बंडा, आलू इत्यादि।

 

फलों के प्रकार

 

फलउदाहरण
सरस फलकेला, अमरूद
पुंज फलरसभरी, स्ट्रोबेरी
सग्रंथिल फलशहतूत, कटहल
आभासी फलसेब

 

फलों के खाद्य भाग

 

फलखाद्य भाग
अमरूदफलभित्ति, बीजाण्डासन
टमाटरफलभित्ति बीजाण्डासन
केलामध्य तथा अंतःभित्ति
चनाबीजपत्र एवं भ्रूण
मूंगफलीबीजपत्र एवं भ्रूण
नारंगीरसयुक्त रोम
कटहलपरिदल पुंज एवं बीज
नारियलभ्रूणपोष
पपीतामध्यफल भित्ति
आममध्यफल भित्ति

 

पादप रोग लक्षण

 

रोगलक्षणकारण
टोबैको मोजैकपत्तियों का सिकुड़नाटोबैको मोजैक विषाणु
पोटेटो मोजैकपत्तियों का चित्तकबरा होनापोटेटो विषाणु
आलू का विल्ट रोगभूरा बलय का बननास्यूडोमोनास सोलेनासियरम
कपास का ब्लैक आर्म रोगपत्तियों पर भूरा धब्बाजैन्थोमोनास जीवाणु
धान का अंगमारी रोगपत्तियों का पीला होनाजैन्थोमोनास ओराइजी ओराइजी

 

तत्वों की कमी से उत्पन्न पादप रोग

 

रोगतत्व की कमी
धान में खैराजस्ता
मटर में मार्श रोगमैंगनीज
फूलगोभी में ब्राउनिंगबोरान
नीबू में लिटिल लीफतांबा
आँवले में निक्रोसिसबोरान

 

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